Transliteration: (Falammaa qadainaa 'alaihil mawta ma dallahum 'alaa mawtiheee illaa daaabbatul ardi taakulu minsa atahoo falammaa kharra tabaiyanatil jinnu al law kaanoo ya'lamoonal ghaiba maa labisoo fil 'azaabil muheen)
"फिर जब हमने उन पर मौत का फ़ैसला फ़रमा दिया [46], तो जिन्नों को उनकी मौत का पता न दिया मगर [47] ज़मीन के कीड़े ने जो उनके असा को खाता रहा; फिर जब वे गिर पड़े, तो जिन्नों पर यह हक़ीक़त खुल गई कि अगर वे ग़ैब जानते होते [48], तो इस ज़िल्लत भरे अज़ाब में मुब्तला न रहते [49]।"
मुफ़स्सिरीन बयान फ़रमाते हैं कि बैतुल मुक़द्दस की तामीर अभी कुछ बाक़ी थी कि हज़रत सुलैमान का वक़्ते विसाल आ पहुंचा। आपने दुआ फ़रमाई कि तामीर मुकम्मल होने तक जिन्नात को आपकी वफ़ात की ख़बर न हो। चुनांचे आप मेहराब में अपने असा पर टेक लगाकर इबादत में खड़े हुए और उसी हालत में आपकी रूह क़ब्ज़ कर ली गई। आप पूरा एक साल उसी हालत में रहे और जिन्नात ख़ौफ़ की वजह से काम करते रहे। इससे यह भी साबित हुआ कि अंबिया-ए-किराम के मुबारक अबदान (शरीर) वफ़ात के बाद भी महफ़ूज़ रहते हैं, दीमक ने लकड़ी खाई मगर नबी के जिस्म को छू भी न सकी।
एक साल बाद जब दीमक ने असा को अंदर से खा लिया तो वह कमज़ोर होकर टूट गया और हज़रत सुलैमान का मुबारक जिस्म ज़मीन पर आ गया। यह एक साल की ताख़ीर मस्जिदे अक़्सा की तामीर की मस्लेहत के तहत थी। इसी तरह हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की तद्फ़ीन में मस्लेहतन कुछ ताख़ीर हुई ताकि ख़िलाफ़त और उम्मत का निज़ाम मुस्तहकम हो सके, जो शरअन जाइज़ था।
इस वाक़िए ने उन लोगों के बातिल अक़ीदे का पर्दाफ़ाश कर दिया जो समझते थे कि जिन्नात को ग़ैब का इल्म होता है। अगर जिन्नों को ग़ैब का इल्म होता, तो वे हज़रत सुलैमान की वफ़ात के बाद एक साल तक दिन-रात सख़्त मशक़्क़त में मुब्तला न रहते। साबित हुआ कि ज़ातन आलिमुल ग़ैब सिर्फ़ अल्लाह तआला है।
जिन्नात के लिए यह सख़्त मज़दूरी एक तरह का ज़िल्लत-आमेज़ अज़ाब थी। इससे उलमा ने दो अहम शरई मस्अले निकाले हैं:
मस्जिद की तामीर में ग़ैर-मुस्लिम कारीगरों व मज़दूरों से काम लेना: जिस तरह हज़रत सुलैमान ने जिन्नात से बैतुल मुक़द्दस की तामीर कराई, उसी तरह मस्जिदों की तामीर में ज़रूरत के तहत ग़ैर-मुस्लिमों की महारत का इस्तेमाल जाइज़ है।
सवाब सिर्फ़ मोमिनों का हक़ है: ज़ाहिरी तामीर में कोई भी काम करे, मगर मस्जिद की रूहानी बरकात और सवाब सिर्फ़ साहेबाने ईमान के लिए मख़सूस है (सूरह तौबा, 9:18)।
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