कुरान - 34:16 सूरह सबअ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

16
فَأَعۡرَضُواْ فَأَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِمۡ سَيۡلَ ٱلۡعَرِمِ وَبَدَّلۡنَٰهُم بِجَنَّتَيۡهِمۡ جَنَّتَيۡنِ ذَوَاتَيۡ أُكُلٍ خَمۡطٖ وَأَثۡلٖ وَشَيۡءٖ مِّن سِدۡرٖ قَلِيلٖ

Transliteration: (Fa a'radoo fa-arsalnaa 'alaihim Sailal 'Arimi wa baddalnaahum bijannataihim jannataini zawaatai ukulin khamtinw wa aslinw wa shai'im min sidrin qaleel)

लेकिन उन्होंने मुंह फेर लिया [55], तो हमने उन पर ज़ोरदार सैलाब (सैले अरिम) भेज दिया [56] और उनके दोनों बाग़ों को दो ऐसे बाग़ों से बदल दिया [57] जिनमें कड़वे फल, और झाऊ (कांटेदार दरख़्त), और कुछ थोड़ी सी बेरियाँ थीं [58]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह सबअ आयत 16 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह सबा तफ़सीर - आयत 16

"लेकिन उन्होंने मुंह फेर लिया [55]। तो हमने उन पर ज़ोरदार सैलाब भेज दिया [56], और उनके दोनों बाग़ों को दो ऐसे बाग़ों से बदल दिया [57] जिनमें कड़वे फल, झाऊ और कुछ थोड़ी सी बेरियाँ थीं [58]।"

[55] मुसलसल हिदायत के बाद भी सरकशी

तारीख़ी रिवायत के मुताबिक़ तेरह अंबिया-ए-किराम ने क़ौमे सबा को अल्लाह की नेमतों की याद दिलाई और उन्हें हिदायत का रास्ता दिखाया, मगर उन्होंने हठधर्मी और ना-शुक्री का रास्ता चुना। उन्होंने ईमान को ठुकरा दिया और उन खुली नेमतों का इनकार किया जो उनके चारों तरफ़ फैली हुई थीं। नेमतों के दरमियान रहकर ना-शुक्री करना ही उनके ज़वाल का सबब बना।

[56] 'सैले अरिम' - अज़ीम सैलाब की तबाही

सरकशी के नतीजे में अल्लाह तआला ने उन पर 'सैले अरिम' यानी बाँध का अज़ीम सैलाब भेज दिया। चूहों के ज़रिये उनके मज़बूत बाँध की नींव कमज़ोर हुई और जब वह टूटा तो पानी के तेज़ रेले ने उनके सरसबज़ बाग़ात, ख़ूबसूरत मकानात और आबाद शहरों को मलियामेट कर दिया। अरब के शोअरा ने भी सबा की इस तबाही को इबरत की मिसाल के तौर पर अपने अशआर में बयान किया है।

[57] ना-शुक्री से नेमतों का ज़वाल

क़ौमे सबा पहले बेपनाह ऐशो इशरत और फ़राख़ी में ज़िंदगी गुज़ार रही थी, मगर उनकी ना-शुक्री ने सब कुछ तबाह कर दिया। यह अज़ीम उसूल सामने आता है कि नेमतों की ना-शुक्री उनके छिन जाने का बाइस बनती है। उनका जन्नत-नज़ीर ख़ित्ता देखते ही देखते एक वीराने में तब्दील हो गया।

[58] फलों से लदे बाग़ों की जगह कांटेदार झाड़ियां

अल्लाह तआला ने उनके लज़ीज़ फलों वाले बाग़ों के बदले कड़वे, बद-ज़ायक़ा फल, झाऊ के दरख़्त और कांटेदार बेरियां उगा दीं, जो आमतौर पर बंजर जंगलों में उगती हैं। यह ज़ाहिर करता है कि जब अल्लाह का अज़ाब आता है तो वह राहत व आराम को ज़िल्लत व तंगी में बदल देता है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now