Transliteration: (Zaalika jazainaahum bimaa kafaroo wa hal nujaazeee illal kafoor)
"यह बदला हमने उन्हें उनकी ना-शुक्री के बाइस दिया [59]; और हम ऐसा बदला ना-शुक्रों के सिवा किसी और को नहीं देते।"
यह आयत क़ौमे सबा पर इलाही फ़ैसले की हिकमत बयान फ़रमाती है: उनका यह अज़ाब किसी ज़ुल्म की बिना पर नहीं, बल्कि महज़ उनकी ना-शुक्री (कुफ़्रान-ए-नेमत) का सीधा नतीजा था। सरसबज़ ज़मीन, ख़ुशगवार मौसम, अम्नो अमान और रिज़्क़ की कसरत के बावजूद उन्होंने अल्लाह का शुक्र अदा न किया और नबी की पैरवी से मुंह मोड़ा।
इससे यह हक़ीक़त रोशन होती है कि जब लोग मुसलसल नेमतों का इनकार करते हैं तो वे ख़ुद अपने ऊपर मुसीबत दावत देते हैं। अल्लाह का शुक्र नेमतों की हिफ़ाज़त करता है, जबकि ना-शुक्री उन्हें छीन लेती है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है कि उसका अज़ाब कभी बे-इंसाफ़ी पर मबनी नहीं होता—वह सिर्फ़ उन्हीं लोगों को सज़ा देता है जो उसकी रहमतों की क़द्र नहीं करते और सरकशी पर अड़े रहते हैं। यह अल्लाह के कामिल अद्ल की दलील है।
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