Transliteration: (Faqaaloo Rabbanaa baa'id baina asfaarinaa wa zalamooo anfusahum faja'alnaahum ahaadeesa wa mazzaq naahum kulla mumazzaq; inna fee zaalika la Aayaatil likulli sabbaarin shakoor)
"मगर उन्होंने कहा: 'ऐ हमारे रब! हमारे सफ़रों के दरमियान दूरियाँ बढ़ा दे [63]!' और उन्होंने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया [64], तो हमने उन्हें अफ़साने बना डाला [65] और उन्हें बिल्कुल टुकड़े-टुकड़े करके बिखेर दिया [66]; बेशक इसमें हर सब्र करने वाले, शुक्रगुज़ार के लिए बड़ी निशानियाँ हैं [67]।"
आसाइश और सहूलत की क़द्र करने के बजाय सबा के मुतलब्बिर रईसों ने तकब्बुर और फ़ख़्र में आकर यह दुआ मांगी कि उनके सफ़रों में दूरियाँ बढ़ा दी जाएं। उनका मक़सद यह था कि ग़रीब लोग उनके साथ आसानी से सफ़र न कर सकें; वे चाहते थे कि रेगिस्तान और वीराने हों ताकि सिर्फ़ वे ही नौकर-चाकर और लश्कर लेकर फ़ख़्र से निकलें। इस अहमक़ाना ना-शुक्री ने उनके ज़वाल की राह हमवार की।
जब किसी क़ौम का अख़्लाक़ी व रूहानी ज़वाल शुरू होता है, तो उसकी अक़्ल मारी जाती है और वह ऐसी चीज़ें मांगने लगती है जो ख़ुद उसकी हलाकत का सबब बनें। यह आयत तालीम देती है कि इंसान को हमेशा आफ़ियत, ख़ैर और शुक्र की दुआ मांगनी चाहिए, न कि अपनी ख़्वाहिशात में पड़कर मुसीबत को आवाज़ देनी चाहिए।
अल्लाह तआला ने उनकी इस ना-शुक्री के बदले उन्हें ऐसा तबाह किया कि वे सिर्फ़ क़िस्से-कहानियाँ बनकर रह गए। बाद में आने वाली नस्लों के लिए उनकी दास्तान इबरत का सबक़ बन गई, और अरबों में मिसाल बन गई कि "वे ऐसे बिखरे जैसे क़ौमे सबा बिखरी थी"।
सैलाब की तबाही के बाद उनकी मुत्तहिद आबादी दुनिया भर में बिखर गई—ग़स्सानी क़बीला शाम चला गया, कुछ ओमान और इराक़ पहुंचे, और औस व ख़ज़रज के बुज़ुर्ग मदीना मुनव्वरा में आबाद हुए। उनकी सल्तनत का शीराज़ा ऐसा बिखरा कि वे दोबारा कभी यकजा न हो सके।
यह तारीख़ी सबक़ हर उस बंदे के लिए मुफ़ीद है जिसके अंदर सब्र और शुक्र की सिफ़त हो। मुसीबतों पर सब्र और नेमतों पर शुक्र ही वह रूहानी सलाहियत है जो इंसान को इलाही निशानियों से सबक़ लेने और अपनी इस्लाह करने की तौफ़ीक़ देती है।
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