Transliteration: (Wa maa kaana lahoo 'alaihim min sultaanin illaa lina'lama mai yu minu bil Aakhirati mimman huwa minhaa fee shakk; wa Rabbuka 'alaa kulli shai'in Hafeez (section 2))
"और उसका उन पर कोई ज़ोर न था, मगर इसलिए कि हम ज़ाहिर कर दें [70] कि आख़िरत पर ईमान रखने वाला कौन है और उससे शक में पड़ा हुआ कौन है [71]। और आपका रब हर चीज़ पर निगहबान है [72]।"
शैतान के पास इंसानों पर कोई हक़ीक़ी क़ुदरत या ज़बरदस्ती का ज़ोर नहीं था कि वह उन्हें खींच कर गुनाह में डाल दे। उसका काम सिर्फ़ वसवसा डालना, बहकाना और झूठी उम्मीदें दिलाना था। इंसान अपने इरादे और इख़्तियार से उसकी पैरवी करता है। जिस तरह आग सिर्फ़ उसी चीज़ को जलाती है जो जलने की सलाहियत रखती हो, उसी तरह शैतान सिर्फ़ उसी को गुमराह कर पाता है जो अंदरूनी तौर पर गुमराही की तरफ़ मायल हो।
इस आज़माइश का मक़सद यह था कि सच्चे अहले ईमान—जिनका दिल आख़िरत के यक़ीन से मुनव्वर है—और उन मुनाफ़िक़ों व मुनकिरों का फ़र्क़ दुनिया पर ज़ाहिर हो जाए जो आख़िरत के बारे में मुसलसल शक में पड़े हुए हैं। ईमान की अस्ल बुनियाद ग़ैब के हक़ायक़ पर पुख़्ता यक़ीन है।
अल्लाह तआला हर चीज़ पर मुहाफ़िज़ और निगहबान (हफ़ीज़) है। शैतान की यह आज़माइश इसलिए नहीं थी कि अल्लाह को कुछ मालूम न था (अल्लाह तो अज़ल से हर बात जानता है), बल्कि मक़सद यह था कि इंसानों के आमाल पर हुज्जत तमाम हो जाए। अल्लाह का इल्म हर पोशीदा नियत और ज़ाहिरी अमल पर मुहीत है।
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