Transliteration: (Wa laa tanfa'ush shafaa'atu 'indahooo illaa liman azina lah; hattaaa izaa fuzzi'a 'an quloobihim qaaloo maazaa qaala Rabbukum; qaalul haqq, wa Huwal 'Aliyul Kabeer)
"और उसके हुज़ूर कोई सिफ़ारिश नफ़ा न देगी सिवाय उसके जिसके लिए वह इजाज़त फ़रमाए। यहाँ तक कि जब [77] उनके दिलों से घबराहट दूर कर दी जाएगी, तो वे पूछेंगे [78]: 'तुम्हारे रब ने क्या फ़रमाया?' वे कहेंगे: 'हक़ फ़रमाया [79]!' और वही सबसे बुलंद, सबसे बड़ा है।"
अल्लाह तआला के जलाल व किबरियाई के सामने बग़ैर इजाज़त कोई लब नहीं हिला सकता। शफ़ाअत का दरवाज़ा सिर्फ़ उन्हीं अंबिया, मुक़र्रब फ़रिश्तों और सालेहीन के लिए खुलेगा जिन्हें अल्लाह इज़्न अता फ़रमाएगा, और वह भी सिर्फ़ उन्हीं लोगों के हक़ में होगी जिनसे अल्लाह राज़ी हो। मुशरिकीन की यह ख़ाम-ख़्याली कि उनके बुत ज़बरदस्ती सिफ़ारिश करा लेंगे, सरतासर बातिल है।
हश्र के दिन जब तक हुक्मे इलाही नहीं होता, हर तरफ़ हैबत और ख़ौफ़ का आलम होगा। मगर जब शफ़ाअत की इजाज़त मरहमत होगी और घबराहट दूर होगी, तो फ़रिश्ते और अहले हश्र एक दूसरे से दरियाफ़्त करेंगे कि रब ने क्या हुक्म फ़रमाया? तब बशारत दी जाएगी कि शफ़ाअत और मग़फ़िरत का परवाना मिल चुका है। हुज़ूर नबी-ए-अकरम ﷺ इस दिन मक़ामे महमूद पर सजदा-रेज़ होकर शफ़ाअते कुबरा फ़रमाएंगे।
जवाब मिलेगा कि अल्लाह का हर फ़रमान ऐन हक़, इंसाफ़ और हिकमत पर मबनी है। शफ़ाअत भी हक़ और इंसाफ़ के दायरे में होगी जो अल्लाह की रहमत का परताव होगी।
आयत का ख़ातमा इस ऐलान पर होता है कि अल्लाह ही 'अल-अलिय्य' (सबसे बुलंद) और 'अल-कबीर' (सबसे बड़ा) है। मख़लूक़ में अंबिया व औलिया को जो भी अज़मत व शफ़ाअत का मर्तबा मिलता है, वह सब अल्लाह ही की अता है और उसकी अज़मत के सामने तमाम कायनात आजिज़ व बे-बस है।
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