Transliteration: (Qul mai yarzuqukum minas samaawaati wal ardi qulil laahu wa innaaa aw iyyaakum la'alaa hudan aw fee dalaalim mubeen)
"आप पूछिए: 'तुम्हें आसमानों और ज़मीन से रिज़्क़ कौन देता है [81]?' आप फ़रमा दीजिए: 'अल्लाह [82]! और बेशक हम या तुम, दोनों में से एक यक़ीनन हिदायत पर है या खुली गुमराही में है [83]।'"
यह सवाल मुशरिकीन के सामने एक खुली दलील के तौर पर रखा गया: आसमान से बारिश, धूप, हवा और ज़मीन से अनाज, फल, पानी और मादनियात का अता फ़रमाने वाला कौन है? मुशरिकीन भी अपने दिल में जानते थे कि यह सब कुछ सिर्फ़ अल्लाह ही के इख़्तियार में है, फिर भी वे पत्थरों के बुतों की इबादत करते थे।
नबी-ए-करीम ﷺ को हुक्म दिया गया कि उनके जवाब का इंतिज़ार किए बग़ैर दो-टोक फ़रमा दें कि 'अल्लाह ही रिज़्क़ देता है'। यह ऐलान मुशरिकीन के तज़ाद को बे-नक़ाब करता है कि जो ज़ात रिज़्क़ देने में तन्हा है, वही इबादत और बंदगी में भी तन्हा और ला-शरीक है।
हुज़ूर ﷺ ने निहायत मुंसिफ़ाना अंदाज़ में फ़रमाया कि हक़ और बातिल दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते। ज़ाहिर है कि हम दोनों में से कोई एक ही सीधी राह पर है और दूसरा खुली गुमराही में पड़ा है। यह अंदाज़ मुख़ातब को सोचने पर मजबूर करता है कि जो तौहीद का पैरोकार है वही हिदायत पर है, और जो बुत-परस्त है वह यक़ीनन खुली गुमराही में ग़र्क़ है।
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