Transliteration: (Wa ja'alnaa bainahum wa bainal qural latee baaraknaa feehaa quran zaahiratanw wa qaddarnaa feehas sayr; seeroo feehaa la yaaliya wa aiyaaman aamineen)
"और हमने उनके और उन बस्तियों के दरमियान जिनमें हमने बरकत रखी थी ऐसी बस्तियाँ बसाई थीं जो सामने नज़र आती थीं [60], और हमने उनमें सफ़र की मंज़िलें मुक़र्रर कर दी थीं [61]; 'इनमें रातों और दिनों में अम्न व अमान के साथ चलो-फिरो [62]।'"
अल्लाह तआला ने क़ौमे सबा (यमन) और बरकत वाली सरज़मीन (शाम व फ़िलिस्तीन) के दरमियान सैकड़ों आबाद बस्तियाँ और गांव बसा रखे थे। यह रास्ता किसी वीराने या रेगिस्तान का न था, बल्कि हर तरफ़ फूल, फल, दरख़्त और बस्तियाँ थीं। एक बस्ती से दूसरी बस्ती साफ़ नज़र आती थी, जिसने उनके तिजारती सफ़र को इन्तिहाई आसान और दिलकश बना दिया था।
ये बस्तियाँ इतनी मुअय्यन और मुतवाज़िन दूरियों पर थीं कि मुसाफ़िर को कोई तकलीफ़ न होती थी। इंसान सुबह का नाश्ता एक बस्ती में करता, दोपहर का खाना दूसरी में खाता, और रात को तीसरी बस्ती में आराम फ़रमाता। उन्हें रास्ते के लिए राशन और पानी का बोझ उठाने की ज़रूरत न पड़ती थी; यह आराम व सहूलत का मुकम्मल निज़ाम था।
अल्लाह ने इस पूरे रास्ते में मुकम्मल हिफ़ाज़त और अम्न अता फ़रमाया था—न डाकुओं और चोरों का ख़ौफ़ था, और न दरिंदों का डर। दिन में भूख-प्यास का कोई ख़तरा न था और रात में किसी दुश्मन का ख़ौफ़ न था। यह अम्न व आसाइश अल्लाह की अज़ीम नेमत थी जिस पर उन्हें शुक्रगुज़ारी और बंदगी का मुज़ाहिरा करना चाहिए था।
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