कुरान - 12:101 सूरह यूहफ़़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

101
۞رَبِّ قَدۡ ءَاتَيۡتَنِي مِنَ ٱلۡمُلۡكِ وَعَلَّمۡتَنِي مِن تَأۡوِيلِ ٱلۡأَحَادِيثِۚ فَاطِرَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ أَنتَ وَلِيِّۦ فِي ٱلدُّنۡيَا وَٱلۡأٓخِرَةِۖ تَوَفَّنِي مُسۡلِمٗا وَأَلۡحِقۡنِي بِٱلصَّـٰلِحِينَ

Transliteration: (Rabbi qad aataitanee minal mulki wa 'allamtanee min taaweelil ahaadees; faati ras samaawaati wal ardi Anta waliyyee fid dunyaa wal Aakhirati tawaffanee muslimanw wa alhiqnee bissaaliheen)

"ऐ मेरे रब! तूने मुझे हुकूमत में से हिस्सा दिया और बातों की तह (सपनों की ताबीर) तक पहुंचना सिखाया। ऐ आकाशों और धरती के पैदा करने वाले! तू ही इस दुनिया और आख़िरत में मेरा कारसाज़ (संरक्षक) है। मुझे इस्लाम की अवस्था में मृत्यु देना और मुझे नेक लोगों में सम्मिलित फ़रमाना।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह यूहफ़़ आयत 101 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह यूसुफ़ – आयत 101 का हिन्दी अनुवाद और तफ़्सीर

✅ [1] हज़रत यूसुफ़ की जामे और दिलकश दुआ

दुन्यावी नेमतों के चरम पर पहुंचकर हज़रत यूसुफ़ दुनिया में नहीं खोए, बल्कि अपने रब के आगे झुक गए। उन्होंने दुआ की: 'ऐ अल्लाह! मुझे दुनिया और आख़िरत में अपना वली बनाए रखना, मुझे मौत भी इस्लाम पर अता करना और आख़िरत में सालिहीन (नेक पैग़म्बरों व बुज़ुर्गों) के साथ उठाना।'

✅ [2] मोमिन का अंतिम मक़सद

यह दुआ हर मोमिन के लिए आदर्श है कि इंसान चाहे कितनी भी दौलत या शोहरत पा ले, उसकी असली आरज़ू हुस्न-ए-ख़ात्मा (ईमान पर ख़ात्मा) और आख़िरत की कामयाबी होनी चाहिए।

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