कुरान - 20:127 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

127
وَكَذَٰلِكَ نَجۡزِي مَنۡ أَسۡرَفَ وَلَمۡ يُؤۡمِنۢ بِـَٔايَٰتِ رَبِّهِۦۚ وَلَعَذَابُ ٱلۡأٓخِرَةِ أَشَدُّ وَأَبۡقَىٰٓ

Transliteration: (Wa kazaalika najzee man asrafa wa lam yu'min bi Aayaati Rabbih; wa la'azaabul Aakhirati ashaddu wa abqaa)

127. और इसी तरह हम बदला देते हैं उस शख़्स को जो हद से बढ़ जाए और अपने रब की आयतों पर ईमान न लाए; और बेशक आख़िरत का अज़ाब सबसे सख़्त और हमेशा बाक़ी रहने वाला है [180] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 127 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 127 की तफ़सीर

"और इसी तरह हम बदला देते हैं उस शख़्स को जो हद से बढ़ जाए और अपने रब की आयतों पर ईमान न लाए; और बेशक आख़िरत का अज़ाब सबसे सख़्त और हमेशा बाक़ी रहने वाला है [180] ।"

[180] हद से तजावुज़ और दायमी अज़ाब

जो दुनिया में इबादत और तक़वा की मशक़्क़त नहीं झेलता, उसे आख़िरत के कभी न ख़त्म होने वाले शदीद अज़ाब का सामना करना पड़ेगा।

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