कुरान - 20:1 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

1
طه

Transliteration: (Taa-Haa)

1. ता-हा। [2] (हुरूफ़े मुक़त्तआत, जिनका हक़ीक़ी इल्म सिर्फ़ अल्लाह को है) (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 1 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 1 की तफ़सीर

"ता-हा। [2]"

[2] हुरूफ़े मुक़त्तआत और हुज़ूर (ﷺ) को तसल्ली

नबी करीम (ﷺ) इबादत में इतनी मशक़्क़त फ़रमाते थे कि आपके मुबारक क़दम सूज जाते थे। आप पूरी-पूरी रात नमाज़ (तहज्जुद) में खड़े रहते थे। यह आयत इसी शान में नाज़िल हुई। या इसका मतलब यह भी है कि नबी करीम (ﷺ) काफ़िरों की इस्लाम के प्रति बेरुख़ी और हठधर्मी पर बहुत रंजीदा व ग़मगीन रहते थे।

इस पर यह मुक़द्दस आयत नाज़िल हुई जिसमें अल्लाह तआला ने अपने हबीब (ﷺ) को तसल्ली देते हुए फ़रमाया: "ऐ हमारे महबूब रसूल! हमने यह क़ुरआन आप पर इसलिए नाज़िल नहीं किया कि आप (इसकी वजह से) किसी जिस्मानी या रूहानी मशक़्क़त व तकलीफ़ में पड़ जाएं।"

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