Transliteration: (Maaa anzalnaa 'alaikal Qur-aana litashqaaa)
"ऐ महबूब! हमने आप पर यह क़ुरआन इसलिए नाज़िल नहीं किया कि आप मशक़्क़त में पड़ जाएं [3];"
नबी करीम (ﷺ) रात भर इबादत में इतने मसरूफ़ रहते थे कि आपके मुबारक क़दमों में वरम (सूजन) आ जाती थी। इस पर मुशरिकों और दुश्मनों ने ताना देना शुरू किया कि यह कलाम तो आपके लिए मशक़्क़त और ज़हमत का बाइस बन गया है।
इस आयत के ज़रिए अल्लाह तआला ने अपने हबीब (ﷺ) को निहायत शफ़क़त व मुहब्बत से तसल्ली दी कि यह क़ुरआन आपको किसी जिस्मानी या नफ़्सियाती रंज व मशक़्क़त में मुब्तला करने के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए रहमत और रूहानी सुकून बनाकर उतारा गया है।
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