Transliteration: (Wa in tajhar bilqawli fainnahoo ya'lamus sirra wa akhfaa)
"और अगर आप बात को बुलंद आवाज़ से कहें, तो बेशक वह तो चुपके से कही हुई बात को और उससे भी ज़्यादा छुपी हुई बात को ख़ूब जानता है। [7]"
"राज़ (चुपके से कही बात)" से मुराद वह बात है जिसे हम खुद जानते हैं लेकिन दूसरों से छुपा कर रखते हैं, जबकि "अख़्फ़ा (उससे भी ज़्यादा छुपा)" उन चीज़ों की तरफ़ इशारा करती है जिनसे हम खुद भी बेख़बर हैं—जैसे कि हमारे आने वाले आमाल, या दिल के वो ख़्यालात और नीयतें जो अभी दिल में पैदा भी नहीं हुई हैं।
इसके कई दर्जात और व्याख्याएं हैं:
राज़ से मुराद हमारे छुपे हुए आमाल हो सकते हैं, और अख़्फ़ा हमारे दिल के वसवसे और ज़ेहनी ख़्यालात हैं।
या फिर, राज़ वो हैं जो जाने-पहचाने भेद हैं, और अख़्फ़ा से मुराद वो इलाही राज़ हैं जिन्हें अल्लाह के सिवा कोई नहीं समझ सकता।
अस्ल पैग़ाम यह है: चाहे गुनाह या इबादत खुलेआम की जाए या चुपके से, अल्लाह सब कुछ ख़ूब जानता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अल्लाह के बुलंद ज़िक्र (ज़ोर से ज़िक्र करने) की मुमानअत है।
जैसे अज़ान, हज में तल्बिया (लब्बैक कहना), और तकबीर-ए-तश्रीक़—ये सब बुलंद आवाज़ से पढ़े जाते हैं और इनकी तरग़ीब दी गई है। लेकिन किसी को यह ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिए कि अल्लाह सिर्फ़ बुलंद आवाज़ ही सुनता है।
बल्कि, बुलंद ज़िक्र का मक़सद इंसान के अपने दिल को बेदार करना, दूसरों को याद दिलाना, और लोगों की तवज्जोह अल्लाह की याद की तरफ़ खींचना है।
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