कुरान - 20:129 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

129
وَلَوۡلَا كَلِمَةٞ سَبَقَتۡ مِن رَّبِّكَ لَكَانَ لِزَامٗا وَأَجَلٞ مُّسَمّٗى

Transliteration: (Wa law laa Kalimatun sabaqat mir Rabbika lakaana lizaamanw wa 'ajalun musammaa)

129. और अगर आपके रब की तरफ़ से एक बात पहले न तय हो चुकी होती [183] और एक मुक़र्ररा वक़्त न होता, तो यक़ीनन अज़ाब उन पर चिपट गया होता [184] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 129 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 129 की तफ़सीर

"और अगर आपके रब की तरफ़ से एक बात पहले न तय हो चुकी होती [183] और एक मुक़र्ररा वक़्त न होता, तो यक़ीनन अज़ाब उन पर चिपट गया होता [184] ।"

[183] उम्मते मुस्तफ़ा (ﷺ) पर आम अज़ाब की मुआफ़ी

अल्लाह तआला ने अपने महबूब (ﷺ) की बरकत से यह वादा फ़रमा रखा है कि इस उम्मत पर पिछली क़ौमों की तरह पूरी बस्ती को तबाह करने वाला अज़ाब दुनिया में नहीं आएगा।

[184] अज़ाब की ताख़ीर

क़ियामत का वक़्त मुक़र्रर न होता तो यह काफ़िर अपने कुफ़्र की पादाश में उसी वक़्त तबाह कर दिए जाते।

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