कुरान - 20:130 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

130
فَٱصۡبِرۡ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَسَبِّحۡ بِحَمۡدِ رَبِّكَ قَبۡلَ طُلُوعِ ٱلشَّمۡسِ وَقَبۡلَ غُرُوبِهَاۖ وَمِنۡ ءَانَآيِٕ ٱلَّيۡلِ فَسَبِّحۡ وَأَطۡرَافَ ٱلنَّهَارِ لَعَلَّكَ تَرۡضَىٰ

Transliteration: (Fasbir 'alaa maa yaqooloona wa sabbih bihamdi Rabbika qabla tuloo'ish shamsi wa qabla ghuroobihaa wa min aanaaa'il laili fasabbih wa atraafan nahaari la 'allaka tardaa)

130. तो आप उनकी बातों पर सब्र फ़रमाएं [185], और सूरज निकलने से पहले [186] और उसके डूबने से पहले अपने रब की हम्द के साथ उसकी पाकी बयान करें; और रात की घड़ियों में भी उसकी पाकी बयान करें और दिन के किनारों पर भी, ताकि आप राज़ी व ख़ुश हो जाएं [187] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 130 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 130 की तफ़सीर

"तो आप उनकी बातों पर सब्र फ़रमाएं [185], और सूरज निकलने से पहले [186] और उसके डूबने से पहले अपने रब की हम्द के साथ उसकी पाकी बयान करें; और रात की घड़ियों में भी उसकी पाकी बयान करें और दिन के किनारों पर भी, ताकि आप राज़ी व ख़ुश हो जाएं [187] ।"

[185] सब्र-ए-जमील की तालीम

हुज़ूर (ﷺ) को मुनकिरीन की तंज़िया और गुस्ताख़ाना बातों पर सब्र करने और इबादत में मशग़ूल रहने का हुक्म दिया गया।

[186] पाँचों नमाज़ों की तरफ़ इशारा

सूरज निकलने से पहले यानी फ़ज्र, डूबने से पहले यानी अस्र, रात की घड़ियों में यानी इशा व तहज्जुद, और दिन के किनारों पर यानी ज़ुहर व मग़रिब की नमाज़ें मुराद हैं।

[187] 'ताकि आप राज़ी हो जाएं'

उम्मत के लिए नमाज़ गुनाहों की बख़्शिश है, मगर हुज़ूर (ﷺ) के लिए नमाज़ क़ुर्बत और दर्जा बुलंद होने का ज़रिया है, यहाँ तक कि आपका मक़ाम इतना बुलंद हो जाए कि आप पूरी तरह राज़ी हो जाएं।

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