कुरान - 20:128 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

128
أَفَلَمۡ يَهۡدِ لَهُمۡ كَمۡ أَهۡلَكۡنَا قَبۡلَهُم مِّنَ ٱلۡقُرُونِ يَمۡشُونَ فِي مَسَٰكِنِهِمۡۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّأُوْلِي ٱلنُّهَىٰ

Transliteration: (Afalam yahdi lahum kam ahlaknaa qablahum minal qurooni yamshoona fee masaakinihim; inna fee zaalika la Aayaatil li ulinnuhaa (section 7))

128. तो क्या उन्हें इस बात ने भी हिदायत न दी कि हमने उनसे पहले कितनी ही क़ौमों को हलाक कर दिया जिनके रहने की जगहों में ये चलते-फिरते हैं [181]? बेशक इसमें अक़्ल वालों के लिए बड़ी निशानियां हैं [182] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 128 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 128 की तफ़सीर

"तो क्या उन्हें इस बात ने भी हिदायत न दी कि हमने उनसे पहले कितनी ही क़ौमों को हलाक कर दिया जिनके रहने की जगहों में ये चलते-फिरते हैं [181]? बेशक इसमें अक़्ल वालों के लिए बड़ी निशानियां हैं [182] ।"

[181] पुरानी तबाह-शुदा बस्तियों से इबरत

कुफ़्फ़ारे मक्का अपने तिजारती सफ़रों में क़ौमे आद और समूद के खंडहरों से गुज़रते थे, मगर फिर भी इबरत हासिल नहीं करते थे।

[182] अस्ल अक़्लमंदी माज़ी से सबक़ लेना है

अक़्लमंद वही है जो दूसरों के अंजाम को देखकर अपने आपको सुधार ले।

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