Transliteration: (Qaala hiya 'asaaya atawakka'u alaihaa wa ahushshu bihaa 'alaa ghanamee wa liya feehaa ma aaribu ukhraa)
"अर्ज़ किया, 'यह मेरा असा (लाठी) है [19]; मैं इस पर टेक लगाता हूँ, और इससे अपनी बकरियों के लिए पत्ते झाड़ता हूँ, और इसमें मेरे दीगर काम भी हैं' [20]।"
हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के इस असा (लाठी) के ऊपरी सिरे पर दो शाख़ें थीं, और इसका नाम 'नबआ' था।
अल्लाह तआला के लाठी के बारे में दरयाफ़्त फ़रमाने की हिकमत यह थी कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को इसके अज़दहा (सांप) बनने के मौजिज़े के लिए पहले से मानूस और तैयार कर दिया जाए, ताकि जब बाद में फ़िरऔन के दरबार में यह मौजिज़ा पेश करें तो उनके दिल में कोई ख़ौफ़ या झिझक बाक़ी न रहे।
इस आयत से यह अज़ीम नुक्ता मालूम होता है कि जब मुहब्बत और अदब में मुक़ाबला हो, तो मुहब्बत ग़ालिब आ जाती है।
अदब का तक़ाज़ा तो यह था कि मुख़्तसर जवाब दिया जाता: "लाठी।"
लेकिन हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपने रब की बारगाह में मुहब्बत व उन्सियत की बिना पर कलाम को तूल दिया (लंबा किया), और असा के मुतअद्दिद फ़ायदे और मसरूफ़ियात बयान करने लगे—ताकि बारगाह-ए-इलाही में बात करने का यह लज़ीज़ सिलसिला और क़ुर्बत ज़्यादा देर तक क़ायम रहे।
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