Transliteration: (Ushdud biheee azree)
" 'उनके ज़रिये मेरी कमर मज़बूत कर दे [28];' "
इससे मालूम हुआ कि हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) को हज़रत मूसा की दुआ के सबब नबूवत अता हुई।
यह वही नबूवत की किस्म है जो कभी-कभी विरासत और ख़ानदान में जारी रही, जैसा कि हज़रत यह्या और हज़रत सुलैमान (अलैहिमुस्सलाम) के वाक़ियात में नज़र आता है।
इसके अलावा इस आयत से दो निहायत अहम शरई अहकाम व मसाइल साबित होते हैं:
ग़ैर-ख़ुदा से मदद तलब करना—जब तक कि वह अस्बाब के तहत और शरअन जाइज़ हो—न तो तवक्कुल के ख़िलाफ़ है और न ही तौहीद के मुनाफ़ी।
अपने किसी अज़ीज़ या रिश्तेदार को अपना नायब व वज़ीर बनाना शरअन मना नहीं है। लिहाज़ा अमीर मुआविया का यज़ीद को नामज़द करना, या हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) का हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) को ख़लीफ़ा बनाना, या हज़रत अली मुर्तज़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) के बाद हज़रत इमाम हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का ख़लीफ़ा बनना कोई गुनाह या नाजाइज़ अमल नहीं था।
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