कुरान - 20:44 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

44
فَقُولَا لَهُۥ قَوۡلٗا لَّيِّنٗا لَّعَلَّهُۥ يَتَذَكَّرُ أَوۡ يَخۡشَىٰ

Transliteration: (Faqoolaa lahoo qawlal laiyinal la allahoo yatazakkkaru 'aw yakhshaa)

44. 'फिर उससे नर्म बात कहना [47], शायद वह नसीहत क़बूल करे या कुछ डरे [48] ।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 44 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 44 की तफ़सीर

" 'फिर उससे नर्म बात कहना [47], शायद वह नसीहत क़बूल करे या कुछ डरे [48] ।' "

[47] नर्म गुफ़्तगू की हिकमत और मिज़ाज का फ़र्क़

अगरचे हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को फ़िरऔन से नर्मी से बात करने का हुक्म हुआ, लेकिन हमारे प्यारे नबी (ﷺ) को फ़रमाया गया: "ऐ नबी! काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों पर जिहाद करो और उन पर सख़्ती फ़रमाओ" (सूरह तहरीम, आयत 9)।

इसकी हिकमत यह है कि हुज़ूर (ﷺ) का मिज़ाज-ए-मुबारक सरापा रहमत व नर्मी था, जबकि हज़रत मूसा का मिज़ाज जलाल वाला था। इसके अलावा फ़िरऔन ने हज़रत मूसा को पाला था, इसलिए उसके एहसान की रियायत में भी नर्मी की हिदायत फ़रमाई गई।

[48] 'शायद वह डरे' का मफ़हूम

यहाँ 'शायद वह डरे' इंसानी एतबार से है, क्योंकि अल्लाह तआला को पहले से इल्म था कि फ़िरऔन कुफ़्र पर ही मरेगा। लेकिन तबलीग़ और हुज्जत पूरी करने का उसूल यही है कि बात नर्मी और उम्मीद के साथ पेश की जाए।

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