Transliteration: (Faatiyaahu faqoolaaa innaa Rasoolaa Rabbika fa arsil ma'anaa Banee Israaa'eela wa laa tu'azzibhum qad ji'naaka bi Aayatim mir Rabbika wassa laamu 'alaa manit taba'al hudaa)
" 'तो तुम दोनों उसके पास जाओ और कहो, 'बेशक हम तेरे रब के भेजे हुए रसूल हैं [51], लिहाज़ा बनी इस्राईल को हमारे साथ भेज दे [52] और उन्हें अज़ाब न दे; बेशक हम तेरे रब की तरफ़ से तेरे पास निशानी लेकर आए हैं; और सलामती उस पर जो हिदायत की पैरवी करे [53] ।' "
इससे मालूम हुआ कि रसूल की पहचान तमाम चीज़ों से पहले ज़रूरी है। इंसान पहले रसूल को पहचानता है, फिर रसूल के ज़रिए अल्लाह तआला की मारिफ़त हासिल करता है। इसी हिकमत के तहत हुज़ूर (ﷺ) ने ऐलान-ए-नबूवत के वक़्त मक्का वालों से पूछा था: "तुमने मुझे कैसा पाया?"
इसका मतलब यह है कि उन्हें अपनी ग़ुलामी और ज़ुल्म से आज़ाद कर दो। इसका यह मतलब नहीं था कि उन्हें मिस्र से निकाल दो, क्योंकि हज़रत मूसा ख़ुद मिस्र में क़ियाम फ़रमाना चाहते थे।
अगर किसी काफ़िर या ग़ैर-मुस्लिम को सलाम करना पड़े, तो इन अल्फ़ाज़ में किया जाए: "अस-सलामु अला मनित-तबाअल हुदा" (सलामती उस पर जो हिदायत की पैरवी करे)। काफ़िर को 'अस्सलामु अलैकुम' या 'रहमतो-बरकत' की दुआ देना शरअन दुरुस्त नहीं है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat