कुरान - 20:77 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

77
وَلَقَدۡ أَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنۡ أَسۡرِ بِعِبَادِي فَٱضۡرِبۡ لَهُمۡ طَرِيقٗا فِي ٱلۡبَحۡرِ يَبَسٗا لَّا تَخَٰفُ دَرَكٗا وَلَا تَخۡشَىٰ

Transliteration: (Wa laqad awhainaaa ilaa Moosaaa an asri bi'ibaadee fadrib lahum tareeqan fil bahri yabasal laa takhaafu darakanw wa laa takhshaa)

77. और बेशक हमने मूसा की तरफ़ वही फ़रमाई कि 'रातों-रात मेरे बंदों को लेकर निकल जाओ [100], और उनके लिए दरिया (नील/क़ुलज़ुम) में एक सूखा रास्ता बना लो [101]; तुम्हें न फ़िरऔन के पकड़ लेने का कोई ख़ौफ़ होगा और न (डूबने का) कोई अंदेशा [102] ।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 77 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 77 की तफ़सीर

"और बेशक हमने मूसा की तरफ़ वही फ़रमाई कि 'रातों-रात मेरे बंदों को लेकर निकल जाओ [100], और उनके लिए दरिया में एक सूखा रास्ता बना लो [101]; तुम्हें न फ़िरऔन के पकड़ लेने का कोई ख़ौफ़ होगा और न कोई अंदेशा [102] ।' "

[100] दुआ की क़बूलियत और चालीस साल बाद ज़हूर

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने फ़िरऔन की हलाकत की दुआ मांगी थी जो बारगाह-ए-इलाही में क़बूल हुई, मगर उसका ज़ाहिरी ज़हूर चालीस साल बाद इस हुक्म के वक़्त हुआ। इससे साबित हुआ कि दुआ की तासीर कभी-कभी हिकमत-ए-इलाही के तहत वक़्फ़े के बाद ज़ाहिर होती है।

[101] असा से दो मुतज़ाद मौजिज़ात

अल्लाह तआला ने अपने महबूब नबी की शान ज़ाहिर फ़रमाने के लिए इसी असा से पत्थर से बारह चश्मे जारी फ़रमाए, और इसी असा से दरिया के गहरे पानी को चीर कर सूखी ज़मीन बना दी।

[102] शबे आशूरा पर ख़ुरूज

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) मुहर्रम की 9 तारीख़ गुज़ार कर आशूरा (10 मुहर्रम) की रात छह लाख सत्तर हज़ार बनी इस्राईलियों को लेकर बहरे क़ुलज़ुम की तरफ़ रवाना हुए (रूहुल बयान)।

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