Transliteration: (Alam yaraw kam ahlak naa qablahum minal qurooni annahum ilaihim laa yarji'oon)
"क्या उन्होंने नहीं देखा [45] कि हमने उनसे पहले कितनी ही नस्लों को हलाक कर दिया, कि वे अब उनकी तरफ़ पलट कर आने वाले नहीं हैं [46]?"
कुरैश अपने तिजारती सफ़रों में क़ौमे आद, समूद और मदयन के तबाहशुदा खंडरात देखते थे, मगर अपने तकब्बुर की वजह से कभी इबरत हासिल नहीं करते थे।
इस आयत से साफ़ साबित हुआ कि दुनिया से जाने वाली रूहें कभी दोबारा दुनिया में वापस नहीं आतीं। इससे हिंदू फ़लसफ़ा-ए-तनासख़ (आवागमन/पुनर्जन्म) का क़तई रद्द होता है। इसी तरह यह आयत उन बातिल फ़िरक़ों (शिया के ग़ुलात) का भी रद्द करती है जो यह अक़ीदा रखते हैं कि हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु क़यामत से पहले दुनिया में दोबारा हुकूमत करने आएंगे। मौत के बाद वापसी मुहाल है, इंसान को इस आरज़ी ज़िंदगी ही में नेकी कमा लेनी चाहिए।
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