कुरान - 36:30 सूरह या-सीन अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

30
يَٰحَسۡرَةً عَلَى ٱلۡعِبَادِۚ مَا يَأۡتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُواْ بِهِۦ يَسۡتَهۡزِءُونَ

Transliteration: (Yaa hasratan 'alal 'ibaaad; maa ya'teehim mir Rasoolin illaa kaanoo bihee yastahzi 'oon)

हाय अफ़सोस ऐसे बंदों पर [43]! उनके पास कोई भी रसूल नहीं आता मगर वे उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं [44]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह या-सीन आयत 30 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह या-सीन तफ़सीर - आयत 30

"हाय अफ़सोस ऐसे बंदों पर [43]! उनके पास कोई भी रसूल नहीं आता मगर वे उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं [44]!"

[43] मुनकिरीन के अंजाम पर अफ़सोस

यह हसरत व अफ़सोस तमाम ज़मानों के उन बद-बख़्त इंसानों पर है जिन्होंने अल्लाह के भेजे हुए रहमत वाले नबियों की क़द्र न पहचानी और अपनी सरकशी से अज़ाबे इलाही को दावत दी।

[44] रसूलों का मज़ाक़ उड़ाना सरीह कुफ़्र है

अल्लाह के रसूलों, उनके कलाम, उनकी सीरत या उनके मुक़द्दस आसार (जैसे नबी की मुबारक नालैन) की ज़रा सी भी तौहीन या इस्तिहज़ा (मज़ाक़) करना सरीह कुफ़्र है। जो लोग नबियों की शान में गुस्ताख़ी करते हैं उनका अंजाम दोनों जहानों में ज़िल्लत व हलाकत है।

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