Transliteration: (Yaa-Seeen)
"या-सीन! [1]"
सूरह या-सीन का आग़ाज़ हुरूफ़े मुक़त्तआत 'या-सीन' से हुआ है। हुरूफ़े मुक़त्तआत के हक़ीक़ी माना अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ही बेहतर जानते हैं। अलबत्ता मुफ़स्सिरीन और मुहद्दिसीन फ़रमाते हैं कि 'या-सीन' हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के मुक़द्दस नामों और ख़िताबों में से एक अज़ीम नाम है, जिसका मफ़हूम "ऐ सैय्यदुल बशर!" या "ऐ इंसान-ए-कामिल!" है, जैसा कि बाक़ी अंबिया को उनके नाम से पुकारा गया मगर अपने महबूब ﷺ को निहायत मोहब्बत व ताज़ीम के साथ मुख़ातब फ़रमाया गया।
सूरह या-सीन की हदीस शरीफ़ में बे-मिसाल फ़ज़ीलत आई है:
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