कुरान - 36:1 सूरह या-सीन अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

1
يسٓ

Transliteration: (Yaa-Seeen)

या-सीन! [1] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह या-सीन आयत 1 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह या-सीन तफ़सीर - आयत 1

"या-सीन! [1]"

[1] 'या-सीन' की अज़मत व मफ़हूम — हुज़ूर ﷺ का मुबारक नाम और क़ुरआन का दिल

सूरह या-सीन का आग़ाज़ हुरूफ़े मुक़त्तआत 'या-सीन' से हुआ है। हुरूफ़े मुक़त्तआत के हक़ीक़ी माना अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ही बेहतर जानते हैं। अलबत्ता मुफ़स्सिरीन और मुहद्दिसीन फ़रमाते हैं कि 'या-सीन' हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के मुक़द्दस नामों और ख़िताबों में से एक अज़ीम नाम है, जिसका मफ़हूम "ऐ सैय्यदुल बशर!" या "ऐ इंसान-ए-कामिल!" है, जैसा कि बाक़ी अंबिया को उनके नाम से पुकारा गया मगर अपने महबूब ﷺ को निहायत मोहब्बत व ताज़ीम के साथ मुख़ातब फ़रमाया गया।

सूरह या-सीन की हदीस शरीफ़ में बे-मिसाल फ़ज़ीलत आई है:

  • हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: "हर चीज़ का एक दिल होता है, और क़ुरआने मजीद का दिल सूरह या-सीन है।" क्योंकि इसमें अक़ाइद के तीन बुनियादी अरकान — तौहीद, रिसालत और आख़िरत — निहायत जामेअ अंदाज़ में बयान हुए हैं।
  • हदीस शरीफ़ में है कि जो शख़्स रात में अल्लाह की रज़ा के लिए सूरह या-सीन की तिलावत करे, उसकी मग़फ़िरत फ़रमा दी जाती है, और इसे दस मर्तबा क़ुरआन पढ़ने का सवाब अता होता है।
  • नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: "अपने मरने वालों (और नज़अ के वक़्त) सूरह या-सीन पढ़ा करो," क्योंकि इसकी तिलावत से रूह आसानी से निकलती है और रहमते इलाही नाज़िल होती है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now