Transliteration: (Laqad haqqal qawlu 'alaaa aksarihim fahum laa yu'minoon)
"बेशक उनमें से अक्सर पर बात साबित हो चुकी है, पस वे ईमान नहीं लाएंगे [7]!"
इस आयत में अल्लाह तआला ने उन मुतकब्बिर सरदारों की बद-क़िस्मती बयान फ़रमाई जिनके मुक़द्दर में कुफ़्र पर मरना तय हो चुका था।
अगर 'अक्सर' से मुराद अहले मक्का के वे ख़ास सरदार (जैसे अबू जहल, अबू लहब, उतबा) हैं जो बद-बातिन थे, तो उन पर अज़ाब की बात साबित हो चुकी थी और वे कुफ़्र पर ही मरे। अलबत्ता आम अहले मक्का तो अल्हम्दुलिल्लाह हुज़ूर ﷺ के सदक़े में बिलाख़िर मुशर्रफ़ ब-इस्लाम हुए। और अगर इससे मुराद पूरी इंसानियत है, तो तारीख़ गवाह है कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से लेकर आज तक शुक्रगुज़ार और कामिल मोमिन हमेशा तादाद में कम रहे हैं, जैसा कि फ़रमाया: "और मेरे बंदों में शुक्रगुज़ार बहुत कम हैं" (सूरह सबा)।
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