Transliteration: (Innaa ja'alnaa feee a'naaqihim aghlaalan fahiya ilal azqaani fahum muqmahoon)
"हमने उनकी गर्दनों में तौक़ डाल दिए हैं जो उनकी ठोड़ियों तक हैं, पस उनके सर ऊपर को खिंच गए हैं [8]!"
तफ़सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान और जामेउल बयान में है कि यह आयत अबू जहल और उसके साथियों (क़बीला-ए-मख़ज़ूम) के हक़ में नाज़िल हुई। अबू जहल ने क़सम खाई थी कि (मआज़अल्लाह) जब वह हुज़ूर ﷺ को नमाज़ पढ़ते देखेगा तो भारी पत्थर से आपका मुबारक सर कुचल देगा।
जब हुज़ूर ﷺ नमाज़ पढ़ रहे थे, अबू जहल भारी पत्थर उठाकर आगे बढ़ा। लेकिन जैसे ही वह नज़दीक पहुँचा, उसके हाथ उसकी गर्दन से चिपक कर पत्थर की तरह सख़्त हो गए और पत्थर उसके हाथ से छूट कर गिर पड़ा। फिर वलीद बिन मुग़ीरा ने कहा कि मैं यह काम करूँगा; जब वह आगे बढ़ा तो अचानक उसकी आँखें अंधी हो गईं और उसे कुछ नज़र न आया। फिर तीसरा शख़्स गया, तो उसने देखा कि एक भयानक सांड उसका रास्ता रोके खड़ा है, पस वह ख़ौफ़ज़दा होकर भाग निकला।
यह तौक़ उनकी ज़ाहिरी बे-बसी का भी सुबूत था और उनके बातिनी तकब्बुर की भी अलामत थी कि उनकी गर्दनें अकड़ी हुई थीं और वे हक़ के आगे सर झुकाने की तौफ़ीक़ से महरूम कर दिए गए थे।
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