Transliteration: (Wal-Qur-aanil-Hakeem)
"हिकमत से भरपूर क़ुरआन की क़सम [2]!"
अल्लाह तआला ने 'क़ुरआने हकीम' की क़सम खाकर कलाम फ़रमाया है। क़ुरआन में क़सम खाना किसी अम्र की अज़मत, हक़्क़ानियत और पुख़्तगी को ज़ाहिर करने के लिए होता है। क़ुरआन को 'हकीम' (हिकमत वाला) फ़रमाया गया क्योंकि इसका हर लफ़्ज़, हर आयत और हर हुक्म कमाल हिकमत और दानिशमंदी पर मब्नी है।
यहाँ एक अज़ीम रूहानी नुक्ता यह है कि क़ुरआन की सच्चाई हुज़ूर ﷺ की नबुव्वत की सच्चाई की ज़ामिन है। जो ज़ात क़ुरआन जैसी बे-नज़ीर और मुअजिज़ किताब लेकर आई, उसकी रिसालत सूरज से ज़्यादा रौशन है।
सन्त और उलमा फ़रमाते हैं कि क़ुरआने मजीद अल्लाह का कलाम है और हुज़ूर ﷺ अल्लाह की मख़्लूक़ में सबसे आला हैं। जो क़ुरआन की तिलावत करे वह 'क़ारी' कहलाता है, मगर जिसने हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की तरह हुज़ूर ﷺ के जमाल का सिद्क़े दिल से मुशाहिदा किया वह 'सहाबी' कहलाया — जो क़ारी से कहीं बुलंद मर्तबा है।
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