कुरान - 36:33 सूरह या-सीन अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

33
وَءَايَةٞ لَّهُمُ ٱلۡأَرۡضُ ٱلۡمَيۡتَةُ أَحۡيَيۡنَٰهَا وَأَخۡرَجۡنَا مِنۡهَا حَبّٗا فَمِنۡهُ يَأۡكُلُونَ

Transliteration: (Wa Aayatul lahumul ardul maitatu ahyainaahaa wa akhrajnaa minhaa habban faminhu ya'kuloon)

और उनके लिए एक निशानी मुर्दा (सूखी) ज़मीन है; हमने उसे ज़िंदा किया [47] और उसमें से अनाज निकाला, तो उसमें से वे खाते हैं; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह या-सीन आयत 33 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह या-सीन तफ़सीर - आयत 33

"और उनके लिए एक निशानी मुर्दा ज़मीन है; हमने उसे ज़िंदा किया [47] और उसमें से अनाज निकाला, तो उसमें से वे खाते हैं;"

[47] ज़मीन की हयात और दिलों की रूहानी ज़िंदगी

बारिश के पानी से बंजर सूखी ज़मीन का जी उठना और उससे तरह-तरह के अनाजों का निकलना अल्लाह की क़ुदरत की खुली निशानी है। जिस तरह पानी से मुर्दा ज़मीन ज़िंदा होती है, उसी तरह वह्ये इलाही और नूरे मुहम्मदी ﷺ से मुर्दा दिल ज़िंदा होते हैं। और जिस तरह ज़मीन से सब्ज़ा उगता है, इसी तरह क़यामत के दिन सूरे इसराफ़ीली से तमाम मुर्दे अपनी क़ब्रों से ज़िंदा होकर निकलेंगे।

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