कुरान - 36:35 सूरह या-सीन अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

35
لِيَأۡكُلُواْ مِن ثَمَرِهِۦ وَمَا عَمِلَتۡهُ أَيۡدِيهِمۡۚ أَفَلَا يَشۡكُرُونَ

Transliteration: (Li ya'kuloo min samarihee wa maa 'amilat-hu aideehim; afalaa yashkuroon)

ताकि वे उसके फल खाएं, हालाँकि उनके हाथों ने इसे नहीं बनाया [49]; तो क्या वे शुक्र अदा नहीं करते [50]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह या-सीन आयत 35 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह या-सीन तफ़सीर - आयत 35

"ताकि वे उसके फल खाएं, हालाँकि उनके हाथों ने इसे नहीं बनाया [49]; तो क्या वे शुक्र अदा नहीं करते [50]?"

[49] फल ख़ालिक़े हक़ीक़ी की अता हैं

इंसान सिर्फ़ बीज बोता है और पानी देता है, मगर दरख़्त में जान डालना, फल में मिठास, रंग और ख़ुशबू पैदा करना किसी इंसान के बस में नहीं। यह सब अल्लाह तआला की क़ुदरत का करिश्मा है।

[50] नेमतों पर शुक्रगुज़ारी का तक़ाज़ा

इतनी बे-मिसाल नेमतें मुफ़्त पाकर भी जो इंसान अल्लाह की वहदानियत और उसके रसूल की रिसालत का शुक्र अदा न करे, वह बद-तरीन ना-शुक्रा है।

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