Transliteration: (Da'waahum feehaa Subhaanakal laahumma wa tahiyyatuhum feehaa salaam; wa aakhiru da'waahum anil hamdu lillaahi Rabbil 'aalameen)
जन्नत में इंसानों पर कोई इबादत या नमाज़ फ़र्ज़ नहीं होगी, लेकिन अल्लाह की नेमतों को देखकर उनकी ज़ुबान से स्वाभाविक रूप से अल्लाह की पाकीज़गी और बड़ाई ('सुब्हानकल्लाहुम्मा') निकलेगी, ठीक उसी तरह जैसे दुनिया में सांस ली जाती है।
फ़रिश्ते और जन्नती आपस में एक-दूसरे को सलामती और शांति की दुआ देंगे, और स्वयं अल्लाह तआला की तरफ़ से उन्हें 'सलाम' कहा जाएगा।
हर नेमत, भोजन और खुशी के अंत में जन्नती अल्लाह का शुक्र अदा करेंगे। यह आयत सिखाती है कि मोमिन को दुनिया में भी हर काम और दुआ का अंत अल्लाह की हम्द व सना के साथ करना चाहिए।
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