कुरान - 10:12 सूरह यूनुस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

12
وَإِذَا مَسَّ ٱلۡإِنسَٰنَ ٱلضُّرُّ دَعَانَا لِجَنۢبِهِۦٓ أَوۡ قَاعِدًا أَوۡ قَآئِمٗا فَلَمَّا كَشَفۡنَا عَنۡهُ ضُرَّهُۥ مَرَّ كَأَن لَّمۡ يَدۡعُنَآ إِلَىٰ ضُرّٖ مَّسَّهُۥۚ كَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِلۡمُسۡرِفِينَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ

Transliteration: (Wa izaa massal insaanad durru da'aanaa li jambiheee aw qaa'idan aw qaaa'iman falammaa kashafnaa 'anhu durrahoo marra ka an lam yad'unaaa ilaa durrin massah; kazaalika zuyyina lilmusrifeena maa kaanoo ya'maloon)

और जब इंसान को कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो वह लेटकर, बैठकर या खड़े होकर हमें पुकारता है। फिर जब हम उसकी तकलीफ़ दूर कर देते हैं, तो वह इस तरह (लापरवाह होकर) चल देता है मानो उसने कभी किसी तकलीफ़ के लिए हमें पुकारा ही न था! इसी तरह हद से बढ़ने वालों के लिए उनके कर्म मनमोहक बना दिए गए हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह यूनुस आयत 12 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह यूनुस – आयत 12 का हिन्दी अनुवाद और तफ़्सीर

✅ [1] संकट में बंदगी और आराम में नाशुक्रापन

यह इंसान के कमज़ोर और अहसानफ़रामोश स्वभाव का सटीक मनोवैज्ञानिक चित्रण है। बीमारी, ग़रीबी या आफ़त के समय वह हर हाल में (करवट पर लेटे, बैठे या खड़े) अल्लाह से रो-रो कर दुआएं मांगता है, लेकिन जैसे ही संकट टलता है, वह अल्लाह को और अपनी दुआओं को ऐसे भुला देता है जैसे कभी कोई तकलीफ़ आई ही न थी।

✅ [2] ग़फ़लत का ख़तरनाक अंजाम

नेक बंदे की पहचान यह है कि वह सुख और दुख दोनों में अल्लाह का शुक्रगुज़ार और आज्ञाकारी बना रहता है। इसके विपरीत, हद से गुज़रने वालों को शैतान उनके ग़लत आमाल को भी अच्छा करके दिखाता है।

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