कुरान - 10:100 सूरह यूनुस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

100
وَمَا كَانَ لِنَفۡسٍ أَن تُؤۡمِنَ إِلَّا بِإِذۡنِ ٱللَّهِۚ وَيَجۡعَلُ ٱلرِّجۡسَ عَلَى ٱلَّذِينَ لَا يَعۡقِلُونَ

Transliteration: (Wa maa kaana linafsin an tu'mina illaa bi iznil laah; wa yaj'alur rijsa 'alal lazeena laa ya'qiloon)

और किसी व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं कि वह ईमान लाए सिवाय अल्लाह की अनुमति (तौफ़ीक़) के; और वह उन लोगों पर गंदगी (अज़ाब व भटकाव) डाल देता है जो बुद्धि से काम नहीं लेते। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह यूनुस आयत 100 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह यूनुस – आयत 100 का हिन्दी अनुवाद और तफ़्सीर

✅ [1] अक़्ल का इस्तेमाल और हिदायत की तौफ़ीक़

ईमान की दौलत उसी को मिलती है जिसे अल्लाह की तौफ़ीक़ हासिल हो। और अल्लाह की तौफ़ीक़ उन बंदों को मिलती है जो अपनी अक़्ल और समझ का सही इस्तेमाल करके हक़ की तलाश करते हैं। जो लोग अक़्ल से काम नहीं लेते, वे कुफ़्र और बुराई की गन्दगी में फँस जाते हैं।

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