कुरान - 10:15 सूरह यूनुस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

15
وَإِذَا تُتۡلَىٰ عَلَيۡهِمۡ ءَايَاتُنَا بَيِّنَٰتٖ قَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَرۡجُونَ لِقَآءَنَا ٱئۡتِ بِقُرۡءَانٍ غَيۡرِ هَٰذَآ أَوۡ بَدِّلۡهُۚ قُلۡ مَا يَكُونُ لِيٓ أَنۡ أُبَدِّلَهُۥ مِن تِلۡقَآيِٕ نَفۡسِيٓۖ إِنۡ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰٓ إِلَيَّۖ إِنِّيٓ أَخَافُ إِنۡ عَصَيۡتُ رَبِّي عَذَابَ يَوۡمٍ عَظِيمٖ

Transliteration: (Wa izaa tutlaa 'alaihim aayaatunaa baiyinaatin qaalal lazeena laa yarjoona liqaaa'a na'ti bi Qur'aanin ghairi haazaaa aw baddilh; qul maa yakoonu leee 'an 'ubaddilahoo min tilqaaa'i nafsee in attabi'u illaa maa yoohaaa ilaiya inneee akhaafu in 'asaytu Rabbee 'azaaba Yawmin 'Azeem)

और जब उनके सामने हमारी स्पष्ट आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वे लोग जो हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, कहते हैं, "इसके अलावा कोई दूसरा क़ुरआन लाओ या इसमें कुछ फेरबदल कर दो!" कह दीजिए, "यह मेरा काम नहीं कि मैं अपनी तरफ़ से इसमें बदलाव करूँ; मैं तो केवल उसी वह्य का पालन करता हूँ जो मेरी ओर भेजी जाती है। यदि मैं अपने रब की नाफ़रमानी करूँ, तो मैं एक बड़े दिन (क़यामत) के अज़ाब से डरता हूँ।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह यूनुस आयत 15 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह यूनुस – आयत 15 का हिन्दी अनुवाद और तफ़्सीर

✅ [1] क़ुरआन में बदलाव की बेतुकी मांग और रसूल ﷺ का दोटूक उत्तर

मुशरिकीन-ए-मक्का चाहते थे कि क़ुरआन से बुतपरस्ती (शिर्क) के ख़िलाफ़ आयतें और आख़िरत के अज़ाब की बातें हटा दी जाएं ताकि उनके रीति-रिवाजों को मंज़ूरी मिल सके। नबी करीम ﷺ ने स्पष्ट कर दिया कि क़ुरआन अल्लाह का कलाम है, किसी इंसान या नबी की अपनी रचना नहीं। नबी तो केवल अल्लाह के हुक्म और वह्य का पाबंद होता है।

✅ [2] रसूलुल्लाह ﷺ की विनम्रता और अल्लाह का डर

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि यदि मैं रब के हुक्म के ख़िलाफ़ एक शब्द भी बदलूँ तो मुझे भी क़यामत के भयानक अज़ाब का भय है। यह संदेश देता है कि दीन के मामलों में किसी समझौते या अपनी मर्ज़ी चलाने की कोई गुंजाइश नहीं है।

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