मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़रियात आयत 18 तफ़सीर
मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)
सूरह अज़-ज़ारियात तफ़सीर - आयत 18
"और रात के आख़िरी पहर (सहरी के वक़्त) मफ़़िरत माँगा करते थे [17]।"
[17] सहरी के वक़्त इस्तिग़फ़ार की अज़मत
हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:
दुआ की क़ुबूलियत का वक़्त: सहरी का वक़्त (सुब्ह-ए-सादिक़ से पहले) तौबा व इस्तिग़फ़ार और दुआओं की क़ुबूलियत का सबसे मुक़द्दस वक़्त है।
मुजर्रब वज़ीफ़ा: फ़ज्र की दो सुन्नतों के बाद अव्वल व आख़िर 11-11 बार दुरूद शरीफ़ के साथ 70 बार इस्तिग़फ़ार पढ़ना बलाओं को दूर करने और रिज़्क़ में बेपनाह बरकत का अज़ीम ज़रिया है।
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