कुरान - 51:19 सूरह अज़-ज़रियात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

19
وَفِيٓ أَمۡوَٰلِهِمۡ حَقّٞ لِّلسَّآئِلِ وَٱلۡمَحۡرُومِ

Transliteration: (Wa feee amwaalihim haqqul lissaaa'ili walmahroom)

और उनके मालों में हक़ था माँगने वाले (साइल) और न माँगने वाले महरूम [18] के लिए। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़रियात आयत 19 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ारियात तफ़सीर - आयत 19

"और उनके मालों में हक़ था माँगने वाले (साइल) और न माँगने वाले महरूम [18] के लिए।"


[18] साइल और महरूम का हक़

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि मोमिनीन के मालों में ग़रीबों का मुक़र्रर हक़ है:

  1. माली ख़िदमत: वे अपने हलाल माल में से ग़रीबों और मोहताजों के खाने, कपड़े और ज़रूरतों का ख़ास हिस्सा निकालते हैं।
  2. बिला-तफ़रीक़ मदद: वे हर माँगने वाले की मदद करते हैं, चाहे उसे जानते हों या न जानते हों।
  3. ग़ैरतमंद महरूमों की तलाश: वे उन सफ़ेदपोश और इज़्ज़तदार लोगों को ढूँढ-ढूँढकर मदद पहुँचाते हैं जो अपनी ग़ैरत और हया की वजह से किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते।
  4. एहसान नहीं, हक़ समझना: वे ग़रीबों को नेफ़्ली मदद देते वक़्त एहसान नहीं जताते बल्कि इसे उनका हक़ समझते हैं और उनका शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने उनकी मदद क़बूल की।

(नोट: यहाँ नफ़्ली सदक़ात का ज़िक्र है, क्योंकि फ़र्ज़ ज़कात हिजरत के बाद मदीना शरीफ़ में फ़र्ज़ हुई थी।)

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