कुरान - 51:25 सूरह अज़-ज़रियात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

25
إِذۡ دَخَلُواْ عَلَيۡهِ فَقَالُواْ سَلَٰمٗاۖ قَالَ سَلَٰمٞ قَوۡمٞ مُّنكَرُونَ

Transliteration: (Iz dakhaloo 'alaihi faqaaloo salaaman qaala salaamun qawmum munkaroon)

जब वे उनके पास आए तो बोले: "सलाम!" [26] उन्होंने फ़रमाया: "सलाम!" ये तो अजनबी लोग हैं [27]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़रियात आयत 25 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ारियात तफ़सीर - आयत 25

"जब वे उनके पास आए तो बोले: 'सलाम!' [26] उन्होंने फ़रमाया: 'सलाम!' ये तो अजनबी लोग हैं [27]!"


[26] सलाम करने का कदीम तरीक़ा व अदब

  • सलाम करना अंबिया-ए-किराम की पुरानी सुन्नत है। आने वाले को सलाम करना चाहिए और बैठने वालों को उसका बेहतर जवाब देना चाहिए। यहाँ सब फ़रिश्तों ने सलाम किया और हज़रत इब्राहीम ने पूरा जवाब दिया।

[27] 'क़ौमुन मुनकरून' (अजनबी लोग)

  • हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने दिल में महसूस किया कि ये अजनबी और ना-वाक़िफ़ लोग हैं।
  • 'मुनकर' अजनबी को कहते हैं; इसी मुनासबत से क़ब्र के फ़रिश्तों को 'मुनकर व नकीर' कहा जाता है क्योंकि मैयत के लिए वे बिल्कुल अजनबी और ना-देखे होते हैं।

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