कुरान - 51:28 सूरह अज़-ज़रियात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

28
فَأَوۡجَسَ مِنۡهُمۡ خِيفَةٗۖ قَالُواْ لَا تَخَفۡۖ وَبَشَّرُوهُ بِغُلَٰمٍ عَلِيمٖ

Transliteration: (Fa awjasa minhum khee fatan qaaloo laa takhaf wa bashsharoohu bighulaamin 'aleem)

तो अपने दिल में उनसे कुछ ख़ौफ़ महसूस किया [29]। वे बोले: "डरो मत [30]!" और उन्होंने उन्हें एक इल्म वाले बेटे (की पैदाइश) की ख़ुशख़बरी दी। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़रियात आयत 28 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ारियात तफ़सीर - आयत 28

"तो अपने दिल में उनसे कुछ ख़ौफ़ महसूस किया [29]। वे बोले: 'डरो मत [30]!' और उन्होंने उन्हें एक इल्म वाले बेटे (की पैदाइश) की ख़ुशख़बरी दी।"


[29] मेहमानों के खाना न खाने पर ख़ौफ़

  • उस ज़माने में यह दस्तूर था कि अगर कोई दुश्मन या नुक़सान पहुँचाने की नीयत से आता था, तो वह मेज़बान का खाना नहीं खाता था। जब मेहमानों ने हाथ नहीं बढ़ाया तो हज़रत इब्राहीम के दिल में ख़दशा पैदा हुआ।
  • हज़रत मुफ़्ती साहब फ़रमाते हैं कि जब फ़रिश्ता वह्य लेकर न आए बल्कि आम सूरत में आए, तो पैग़म्बर को भी फ़ौरन उसका फ़रिश्ता होना मालूम न होना मुमकिन है; अलबत्ता वह्य लाते वक़्त फ़रिश्ते की पहचान लाज़िमी होती है।

[30] तसल्ली और आलिम फ़रज़ंद की बशारत

  • फ़रिश्तों ने फ़ौरन अर्ज़ किया: 'आप ख़ौफ़ न कीजिए, हम अल्लाह के भेजे हुए फ़रिश्ते हैं।'
  • उन्होंने हज़रत इब्राहीम को बुढ़ापे के बावजूद एक इल्म व दानिश वाले बेटे (हज़रत इस्हाक़) की पैदाइश की मुबारक़बाद और ख़ुशख़बरी दी।

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