कुरान - 51:51 सूरह अज़-ज़रियात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

51
وَلَا تَجۡعَلُواْ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَۖ إِنِّي لَكُم مِّنۡهُ نَذِيرٞ مُّبِينٞ

Transliteration: (Wa laa taj'aloo ma'al laahi ilaahan aakhara innee lakum minhu nazeerum mubeen)

और अल्लाह के साथ कोई दूसरा माबूद न ठहराओ। बेशक मैं उसकी तरफ़ से तुम्हारे लिए खुला डर सुनाने वाला (रसूल) हूँ [59]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़रियात आयत 51 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ारियात तफ़सीर - आयत 51

"और अल्लाह के साथ कोई दूसरा माबूद न ठहराओ। बेशक मैं उसकी तरफ़ से तुम्हारे लिए खुला डर सुनाने वाला (रसूल) हूँ [59]!"


[59] तौहीद और रिसालत का लाज़िम व मलज़ूम होना

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

  • तौहीद की ताकीद: 'अल्लाह के साथ कोई दूसरा माबूद न ठहराओ' तौहीद-ए-ख़ालिस का बुनियादी उसूल है कि इबादत के लायक़ सिर्फ़ अल्लाह की ज़ात है।
  • तौहीद व रिसालत का जोड़: इसके फ़ौरन बाद हुज़ूर ﷺ की रिसालत का ज़िक्र यह सिखाता है कि ईमान में तौहीद और रिसालत दोनों लाज़िम व मलज़ूम हैं। अल्लाह को रसूल के बग़ैर मानना या रसूल को अल्लाह से जुदा करना कुफ़्र है। हज़रत हस्सान बिन साबित (रज़ियल्लाहु अन्हु) फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला ने अपने नाम के साथ अपने प्यारे नबी ﷺ का नाम अता फ़रमाया है।

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