कुरान - 51:55 सूरह अज़-ज़रियात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

55
وَذَكِّرۡ فَإِنَّ ٱلذِّكۡرَىٰ تَنفَعُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Wa zakkir fa innaz zikraa tanfa'ul mu'mineen)

और नसीहत फ़रमाते रहिए [64], क्योंकि नसीहत ईमान वालों को फ़ायदा पहुँचाती है [65]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़रियात आयत 55 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ारियात तफ़सीर - आयत 55

"और नसीहत फ़रमाते रहिए [64], क्योंकि नसीहत ईमान वालों को फ़ायदा पहुँचाती है [65]!"


[64] दावत व तबलीग़ का मुसलसल सिलसिला

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि मुनकिरीन से मुँह फेरने के बावजूद दावत व तबलीग़ और नसीहत का सिलसिला बंद नहीं होगा; आप बराबर नसीहत फ़रमाते रहें क्योंकि यह दावत हमेशा जारी रहने वाली है।


[65] नसीहत अहले ईमान के लिए नफ़ा-बख़्श

  • हर ज़मीन में बीज नहीं उगता; नसीहत सिर्फ़ उसी दिल में असर करती है जिसकी तक़दीर में ईमान और भलाई लिखी हो।
  • मोमिनों को जब नसीहत की जाती है, तो उनके ईमान, तक़वा और आमाल में ताज़गी व इज़ाफ़ा होता है। चुनाँचे दावत का काम जारी रखना हर हाल में मुफ़ीद है।

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