Transliteration: (Maaa ureedu minhum mir rizqinw wa maaa ureedu anyyut'imoon)
"मैं उनसे कोई रोज़ी (रिज़्क़) नहीं माँगता [67], और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे खाना खिलाएँ [68]!"
अल्लाह तआला अपनी मख़लूक़ से किसी रिज़्क़ का तलबगार नहीं; बल्कि वह ख़ुद तमाम इंसानों, जिन्नों और जानवरों को रोज़ी देने वाला है। इंसान की तख़लीक़ का मक़सद सिर्फ़ पेट भरना नहीं बल्कि बंदगी करना है।
हज़रत मुफ़्ती साहब फ़रमाते हैं कि दुनिया के बादशाह अपनी सल्तनत और ख़र्च के लिए रिआया के टैक्स और नज़राने के मोहताज होते हैं, लेकिन अल्लाह तआला की बादशाही किसी मख़लूक़ की मदद या ख़िदमत की मोहताज नहीं; वह पूरी तरह बे-नियाज़ और ग़नी है।
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