कुरान - 51:57 सूरह अज़-ज़रियात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

57
مَآ أُرِيدُ مِنۡهُم مِّن رِّزۡقٖ وَمَآ أُرِيدُ أَن يُطۡعِمُونِ

Transliteration: (Maaa ureedu minhum mir rizqinw wa maaa ureedu anyyut'imoon)

मैं उनसे कोई रोज़ी (रिज़्क़) नहीं माँगता [67], और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे खाना खिलाएँ [68]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़रियात आयत 57 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ारियात तफ़सीर - आयत 57

"मैं उनसे कोई रोज़ी (रिज़्क़) नहीं माँगता [67], और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे खाना खिलाएँ [68]!"


[67] अल्लाह हक़ीक़ी राज़िक़ है

अल्लाह तआला अपनी मख़लूक़ से किसी रिज़्क़ का तलबगार नहीं; बल्कि वह ख़ुद तमाम इंसानों, जिन्नों और जानवरों को रोज़ी देने वाला है। इंसान की तख़लीक़ का मक़सद सिर्फ़ पेट भरना नहीं बल्कि बंदगी करना है।


[68] शाहाना मोहताजी से पाक ज़ात

हज़रत मुफ़्ती साहब फ़रमाते हैं कि दुनिया के बादशाह अपनी सल्तनत और ख़र्च के लिए रिआया के टैक्स और नज़राने के मोहताज होते हैं, लेकिन अल्लाह तआला की बादशाही किसी मख़लूक़ की मदद या ख़िदमत की मोहताज नहीं; वह पूरी तरह बे-नियाज़ और ग़नी है।

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