Transliteration: (Fa inna lillazeena zalamoo zanoobam misla zanoobi ashaabihim falaa yasta'jiloon)
"पस बेशक उन ज़ालिमों के लिए भी (अज़ाब का) एक हिस्सा है जैसा उनके साथियों का हिस्सा था [71], तो वे मुझसे अज़ाब की जल्दी न मचाएँ [72]!"
हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि 'ज़नूब' कुएँ से पानी खींचने वाले बड़े डोल को कहते हैं। जिस तरह कुएँ पर पानी भरने वालों की बारी तय होती है, उसी तरह हर नाफ़रमान और ज़ालिम क़ौम के अज़ाब की एक मुक़र्ररा बारी और वक़्त है जो अपने ठीक वक़्त पर आकर रहेगा।
काफ़िरों को अज़ाब माँगने की जल्दी नहीं करनी चाहिए; जब उनकी बारी आएगी तो कोई उन्हें बचा नहीं सकेगा। सब्र करना और तौबा की तरफ़ लौटना ही अक़्लमंदी है।
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