कुरान - 33:13 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

13
وَإِذۡ قَالَت طَّآئِفَةٞ مِّنۡهُمۡ يَـٰٓأَهۡلَ يَثۡرِبَ لَا مُقَامَ لَكُمۡ فَٱرۡجِعُواْۚ وَيَسۡتَـٔۡذِنُ فَرِيقٞ مِّنۡهُمُ ٱلنَّبِيَّ يَقُولُونَ إِنَّ بُيُوتَنَا عَوۡرَةٞ وَمَا هِيَ بِعَوۡرَةٍۖ إِن يُرِيدُونَ إِلَّا فِرَارٗا

Transliteration: (Wa iz qaalat taaa'ifatum minhum yaaa ahla Yasriba laa muqaamaa lakum farji'oo; wa yastaazinu fareequm minhumun Nabiyya yaqooloona inna buyootanaa 'awrah; wa maa hiya bi'awratin iny yureedoona illaa firaaraa)

और जब उनमें से एक गिरोह ने कहा, 'ऐ मदीना [29] वालो! तुम्हारे ठहरने का कोई मौक़ा नहीं [30], पस वापस लौट चलो;' और उनका एक गिरोह नबी से इजाज़त मांगने [31] लगा कि 'हमारे घर ग़ैर-महफ़ूज़ हैं,' हालाँकि वे ग़ैर-महफ़ूज़ न थे, वे तो सिर्फ़ भागना [32] चाहते थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 13 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 13

"और जब उनमें से एक गिरोह ने कहा, 'ऐ मदीना [29] वालो! तुम्हारे ठहरने का कोई मौक़ा नहीं [30], पस वापस लौट चलो;' और उनका एक गिरोह नबी से इजाज़त मांगने [31] लगा कि 'हमारे घर ग़ैर-महफ़ूज़ हैं,' हालाँकि वे ग़ैर-महफ़ूज़ न थे, वे तो सिर्फ़ भागना [32] चाहते थे।"

[29] मदीना मुनव्वरा को 'यस्रिब' कहना

मुनाफ़िक़ों ने मदीना मुनव्वरा को 'यस्रिब' कहकर पुकारा, जो कि तकलीफ़ और ख़राबी के मफ़हूम से जुड़ा हुआ लफ़्ज़ है, जबकि अहले ईमान इसे अक़ीदत व एहतिराम से मदीना तय्यिबा, बतहा वग़ैरा कहते हैं। मुक़द्दस शहर के लिए लफ़्ज़ यस्रिब का इस्तेमाल निफ़ाक़ और कमज़ोर ईमान की निशानी है। यह नाम अमालिका के एक सरदार यस्रिब बिन आबील से मंसूब था या अरबी माद्दे ‘सर्ब’ से मुश्तक़ है जिसके मानी मलामत व तकलीफ़ के हैं। इसलिए इस पाक शहर को यस्रिब कहना मना फ़रमाया गया है।

[30] बददिली फैलाना और मैदान छोड़ने की साज़िश

मुनाफ़िक़ों के एक गिरोह ने मुसलमानों को बददिल करने की साज़िश की कि दुश्मन बहुत ताक़तवर है और तुम उसका मुक़ाबला नहीं कर सकते। उन्होंने लोगों को अपने घरों को लौट जाने का मशविरा दिया, और बहुत से लोग मैदान छोड़कर भाग गए, जिससे उनका निफ़ाक़ खुलकर सामने आ गया। जबकि जो साबित-क़दम रहे उन्होंने अपने सच्चे ईमान और इख़्लास का सुबूत दिया।

[31] जंग से फ़रार के लिए झूठे बहाने

क़बीला बनू सलमा और बनू हारिसा के कुछ लोग हुज़ूर नबी-ए-अकरम ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुए और झूठे उज़्र तराशे—कि हमारे घर खुले और बे-हिफ़ाज़त पड़े हैं और उन्हें हिफ़ाज़त की ज़रूरत है—हालाँकि हक़ीक़त में वे पूरी तरह महफ़ूज़ थे। यह सिर्फ़ फ़र्ज़ और ज़िम्मेदारी से भागने का एक बहाना था।

[32] बातिनी नियत का बे-नक़ाब होना

अल्लाह तआला ने उनकी असली नियत को ज़ाहिर फ़रमा दिया, और साफ़ बता दिया कि उनका असली मक़सद जंग से भागना था, न कि अपने घरों की हिफ़ाज़त करना। नाज़ुक तरीन वक़्त में यह बुज़दिली और ग़द्दारी सख़्त ना-क़ाबिले मुआफ़ी थी, और बग़ैर इजाज़त भागने वाले और झूठे बहाने बनाने वाले दोनों बराबर के मुजरिम ठहराए गए।

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