कुरान - 33:14 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

14
وَلَوۡ دُخِلَتۡ عَلَيۡهِم مِّنۡ أَقۡطَارِهَا ثُمَّ سُئِلُواْ ٱلۡفِتۡنَةَ لَأٓتَوۡهَا وَمَا تَلَبَّثُواْ بِهَآ إِلَّا يَسِيرٗا

Transliteration: (wa law dukhilat 'alaihim min aqtaarihaa summa su'ilul fitnata la aatawhaa wa maa talabbasoo bihaaa illaa yaseeraa)

और अगर उनके अतराफ़ (किनारों) से (दुश्मन के लश्कर) मदीना में दाख़िल हो जाते, फिर उनसे फ़ितने (मुसलमानों से जंग व कुफ़्र) का मुतालबा किया जाता [33], तो वे फ़ौरन इसमें शामिल हो जाते और इसमें बहुत ही कम हिचकिचाते। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 14 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 14

"और अगर उनके अतराफ़ (किनारों) से (दुश्मन के लश्कर) मदीना में दाख़िल हो जाते, फिर उनसे फ़ितने (मुसलमानों से जंग व कुफ़्र) का मुतालबा किया जाता [33], तो वे फ़ौरन इसमें शामिल हो जाते और इसमें बहुत ही कम हिचकिचाते।"

[33] मुनाफ़िक़ों की असली फ़ितरत का बे-नक़ाब होना

यह आयत उन लोगों की बुज़दिली और निफ़ाक़ को पूरी तरह बे-नक़ाब करती है जिन्होंने अपने घरों के ग़ैर-महफ़ूज़ होने का झूठा दावा किया था। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अगर दुश्मन मदीना के तमाम किनारों से अंदर दाख़िल हो जाता और इन मुनाफ़िक़ों से मुतालबा करता कि इस्लाम छोड़ दें और मुसलमानों के ख़िलाफ़ जंग में उनका साथ दें, तो ये फ़ौरन मुरतद (दीन से फिरने वाले) हो जाते।

यह इस बात का खुला सुबूत है कि हक़ीक़ी ईमान कभी उनके दिलों में दाख़िल ही नहीं हुआ था—इस्लाम के साथ उनका तअल्लुक़ सिर्फ़ ज़ाहिरी और दिखावे का था। वे ज़रा भी मुज़ाअमत (विरोध) न करते और पल भर में दुश्मन के साथ मिल जाते, जिससे साबित हुआ कि वे कभी भी इस्लाम के वफ़ादार न थे।

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