Transliteration: (Wa iz yaqoolul munaafiqoona wallazeena fee quloobihim maradum maa wa'adanal laahu wa Rasooluhooo illaa ghurooraa)
"और जब मुनाफ़िक़ और वे लोग जिनके दिलों में बीमारी [27] थी कहने लगे, 'अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे जो वादा किया था वह फ़रेब के सिवा कुछ न था' [28]!"
यह आयत उन मुनाफ़िक़ों के चेहरे से पर्दा उठाती है जो ज़ाहिर में तो इस्लाम का इज़हार करते थे मगर बातिन में काफ़िर थे। उनके दिल शक व बे-यक़ीनी की बीमारी में मुब्तला थे, और वे हमेशा ईमान और कुफ़्र के दरमियान डांवाडोल रहते थे। उनका यह दोहरा रवैया बताता था कि ईमान कभी उनके दिलों में रासिख़ (मज़बूत) नहीं हुआ था।
जब जंगे ख़ंदक़ में उन्होंने दुश्मन का अज़ीम मुत्तहिदा लश्कर देखा, तो मोअत्तब इब्ने क़ुशैर ने तंज़िया तौर पर कहा कि हुज़ूर ﷺ तो हमें क़ैसर व किसरा (रोम व फ़ारस) की फ़तह के वादे देते थे, जबकि आज हम मदीने में घिरे बैठे हैं और रफ़अ-ए-हाजत के लिए भी बाहर नहीं निकल सकते। यह बात उनके गहरे निफ़ाक़ और इलाही वादों के खुले इंकार का इज़हार थी, जिसकी दूसरे मुनाफ़िक़ों ने भी ताईद की।
ऐसे कलमात न सिर्फ़ बे-ईमानी थे बल्कि अल्लाह और उसके प्यारे रसूल ﷺ की शान में खुली गुस्ताख़ी थे, जिसने आज़माइश के वक़्त उनकी असली हक़ीक़त को आशकार कर दिया।
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