Transliteration: (Wa laqad kaanoo 'aahadul laaha min qablu laa yuwal loonal adbaar; wa kaana 'ahdul laahi mas'oolaa)
"और बेशक उन्होंने इससे पहले अल्लाह से अहद किया था कि वे अपनी पीठ न फेरेंगे [34]; और अल्लाह से किए हुए अहद की ज़रूर बाज़पुर्स होगी [35]।"
यह आयत-ए-मुबारका एक अज़ीम उसूल तय फ़रमाती है: हुज़ूर नबी-ए-अकरम ﷺ से किया गया कोई भी अहद अल्लाह तआला ही से अहद के बराबर है। हुज़ूर ﷺ अल्लाह तआला के नाइब-ए-अकबर और मुतलक़ नुमाइंदे हैं। लिहाज़ा आपकी नाफ़रमानी करना या आपसे किए गए अहद को तोड़ना दरहक़ीक़त बराहे रास्त अल्लाह तआला के अहद को तोड़ने के मुतरादिफ़ है।
इसी से उलमा-ए-किराम यह इस्तिम्बात फ़रमाते हैं कि हक़ीक़ी मुर्शिद व शैख़-ए-कामिल के हाथ पर बैअत करना दर-अस्ल हुज़ूर ﷺ से ही तअल्लुक़ व रब्त क़ायम करना है, लिहाज़ा इसे पूरी संजीदगी से निभाना चाहिए।
क़बीला बनू हारिसा और बनू सलमा के लोग जो जंगे उहुद में पीछे हट गए थे, उन्होंने बाद में हुज़ूर ﷺ से अहद किया था कि वे आइंदा कभी मैदान से पीठ नहीं दिखाएंगे। लेकिन जंगे ख़ंदक़ में उन्होंने फिर उस अहद को तोड़ दिया, जिसकी यहाँ शदीद मज़म्मत फ़रमाई गई।
अल्लाह तआला फ़रमाता है कि आमाल की तरह वादों और अहदों के बारे में भी बाज़पुर्स होगी। यह ज़ाहिर करता है कि ज़बानी अहद, ख़ास तौर पर जो अल्लाह के नाम पर या उसके प्यारे रसूल ﷺ से किए जाएं, बेपनाह अहमियत रखते हैं और उन पर सख़्त पकड़ होगी। ऐसे अहद को तोड़ना संगीन जुर्म है, और अहद को पूरा करने में इख़्लास ही सच्चे मोमिनों की लाज़िमी सिफ़त है।
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