Transliteration: (Qul man zal lazee ya'simukum minal laahi in araada bikum sooo'an aw araada bikum rahmah; wa laa yajidoona lahum min doonil laahi waliyyanw wa laa naseeraa)
"आप फ़रमा दीजिए: 'कौन है जो तुम्हें अल्लाह के हुक्म से बचा सके अगर वह तुम्हारे साथ कोई बुराई (अज़ाब) चाहे या तुम पर कोई रहमत फ़रमाना चाहे' [37]? और वे अल्लाह के सिवा न अपना कोई हिमायती पाएंगे और न कोई मददगार [38]।"
यहाँ "बुराई (ज़रर)" से मुराद मौत या क़त्ल होना है, जिसे मुनाफ़िक़ और बुज़दिल ना-पसंद करते हैं, जबकि "रहमत" से मुराद ज़िंदगी और सलामती है जिसकी वे आरज़ू करते हैं। लेकिन एक सच्चे मोमिन के नज़दीक शहादत पाना भी अल्लाह की रहमत है, और बुज़दिली के साथ ज़िंदा बचना अज़ाब है। यह आयत ताकीद फ़रमाती है कि अल्लाह के फ़ैसले को कोई टालने वाला नहीं—नुक़सान पहुँचाना हो या नफ़ा देना, यह मख़लूक़ के इख़्तियार में नहीं।
यह आयत मुबारका कई अहम अस्बाक़ (सबक़) बयान फ़रमाती है:
मौत यक़ीनी है, और मैदान-ए-जंग से भागना न इसे टाल सकता है और न इसमें देर कर सकता है।
आज़माइशों से फ़रार होना और जिहाद के फ़रीज़े को छोड़ना ज़िल्लत व रुसवाई लाता है, न कि नजात।
जो शख़्स ख़ालिक़ को छोड़कर मख़लूक़ में पनाह तलाश करता है वह निहायत बे-वक़ूफ़ है। इसके बरअक्स ख़ालिक़ की रज़ा की ख़ातिर तमाम मख़लूक़ को छोड़ देना ही हक़ीक़ी कामियाबी है।
बिलआख़िर अगर अल्लाह किसी को अज़ाब देने का इरादा फ़रमाए, तो कोई मददगार या हिमायती उसे बचा नहीं सकता—लश्कर और इत्तिहाद भी काम नहीं आते। इसके बरअक्स अगर अल्लाह रहमत फ़रमाना चाहे, तो कोई ताक़त उसे रोक नहीं सकती।
लिहाज़ा कामिल भरोसा और तवक्कुल सिर्फ़ अल्लाह तआला पर और उसके बरगुज़ीदा बंदों पर होना चाहिए, जिनकी मदद दर-अस्ल अल्लाह ही की नुसरत का मज़हर है।
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