Transliteration: (Qad ya'lamul laahul mu'awwiqeena minkum walqaaa'ileena li ikhwaanihim halumma ilainaa, wa laa yaatoonal baasa illaa qaleelaa)
"बेशक अल्लाह तुममें से उन लोगों को ख़ूब जानता है जो (दूसरों को जिहाद से) रोकते हैं और अपने भाइयों से कहते हैं कि 'हमारी तरफ़ आ जाओ [39];' और वे लड़ाई में नहीं आते मगर बहुत ही कम [40]।"
मदीना के यहूदियों ने पोशीदा तौर पर मुनाफ़िक़ों से राब्ता क़ायम किया और दावा किया कि वे उनके हक़ीक़ी इत्तिहादी हैं, और डराया कि हुज़ूर ﷺ के साथ रहने का अंजाम अबू सुफ़ियान और क़ुरैश के हाथों तबाही के सिवा कुछ न होगा। इसके जवाब में मुनाफ़िक़ों ने ख़ौफ़ और शक फैलाकर मोमिनीन के अज़्म को कमज़ोर करने की नापाक कोशिश की। लेकिन सच्चे मोमिन अपने ईमान पर और ज़्यादा साबित-क़दम हो गए, और ऐलान किया कि हुज़ूर नबी-ए-पाक ﷺ की पाकीज़ा सोहबत में जान देना ही सबसे बेहतरीन मौत है।
जब मुनाफ़िक़ मैदान-ए-जंग में आते भी थे, तो यह सिर्फ़ दिखावे और रस्म के तौर पर होता था—या तो मुसलमानों को धोखा देने के लिए या उनकी सफ़ों में इंतिशार पैदा करने के लिए। उनकी यह शिरकत किसी इख़्लास या फ़रमांबरदारी की वजह से नहीं थी, बल्कि कुफ़्र और ग़द्दारी का एक रूप थी। चुनांचे उनकी इस ज़ाहिरी मौजूदगी की कोई रूहानी क़द्र व क़ीमत न थी, और अल्लाह उनके फ़रेब और फ़साद से पूरी तरह बा-ख़बर है।
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