कुरान - 33:19 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

19
أَشِحَّةً عَلَيۡكُمۡۖ فَإِذَا جَآءَ ٱلۡخَوۡفُ رَأَيۡتَهُمۡ يَنظُرُونَ إِلَيۡكَ تَدُورُ أَعۡيُنُهُمۡ كَٱلَّذِي يُغۡشَىٰ عَلَيۡهِ مِنَ ٱلۡمَوۡتِۖ فَإِذَا ذَهَبَ ٱلۡخَوۡفُ سَلَقُوكُم بِأَلۡسِنَةٍ حِدَادٍ أَشِحَّةً عَلَى ٱلۡخَيۡرِۚ أُوْلَـٰٓئِكَ لَمۡ يُؤۡمِنُواْ فَأَحۡبَطَ ٱللَّهُ أَعۡمَٰلَهُمۡۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٗا

Transliteration: (Ashihhatan 'alaikum faizaa jaaa'al khawfu ra aytahum yanzuroona ilaika tadooru a'yunuhum kallazee yughshaa 'alaihi minal mawti fa izaa zahabal khawfu salqookum bi alsinatin hidaadin ashihhatan 'alal khayr; ulaaa'ika lam yu'minoo fa ahbatal laahu a'maalahum; wa kaana zaalika 'alal laahi yaseeraa)

वे तुम्हारे मुक़ाबले में सख़्त बुख़्ल (कंजूसी) करते हैं; फिर जब ख़ौफ़ का वक़्त आता है, तो आप उन्हें देखते हैं कि वे आपकी तरफ़ नज़रें जमाए देख रहे हैं, उनकी आँखें इस तरह घूम रही हैं [41] जैसे किसी पर मौत [42] की बेहोशी छा गई हो; फिर जब ख़ौफ़ दूर हो जाता है [43], तो वे तेज़ ज़बानों से तुम पर ताने मारते हैं, माल (ग़नीमत) पर बड़े हरीस बनकर [44]; ये लोग ईमान लाए ही नहीं [45], चुनांचे अल्लाह ने उनके आमाल ज़ाया कर दिए [46]; और यह अल्लाह के लिए बहुत आसान [47] है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 19 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 19

"वे तुम्हारे मुक़ाबले में सख़्त बुख़्ल (कंजूसी) करते हैं; फिर जब ख़ौफ़ का वक़्त आता है, तो आप उन्हें देखते हैं कि वे आपकी तरफ़ नज़रें जमाए देख रहे हैं, उनकी आँखें इस तरह घूम रही हैं [41] जैसे किसी पर मौत [42] की बेहोशी छा गई हो; फिर जब ख़ौफ़ दूर हो जाता है [43], तो वे तेज़ ज़बानों से तुम पर ताने मारते हैं, माल (ग़नीमत) पर बड़े हरीस बनकर [44]; ये लोग ईमान लाए ही नहीं [45], चुनांचे अल्लाह ने उनके आमाल ज़ाया कर दिए [46]; और यह अल्लाह के लिए बहुत आसान [47] है।"

[41] ख़ौफ़ से आँखों का पथराना और घूमना

इंतिहाई ख़ौफ़ के आलम में, जैसे जंग की शुरुआत के वक़्त, मुनाफ़िक़ों की आँखें बदहवासी से घूमने लगती हैं, बिल्कुल उस शख़्स की तरह जो डूब रहा हो या जिस पर नज़अ (मौत) की सख़्ती तारी हो चुकी हो।

[42] चेहरों पर दहशत के आसार

सच्चे मोमिनों के बरअक्स जिनके चेहरे इत्मीनान और अल्लाह पर कामिल भरोसे से चमकते हैं, मुनाफ़िक़ों के चेहरे फ़क़ और बदहवास हो जाते हैं, जो उनके दिलों के अंदर की दहशत को बे-नक़ाब करता है।

[43] जब ख़तरा टल जाता है

जब ख़तरा दूर हो जाता है और फ़तह या माले ग़नीमत ज़ाहिर होता है, तो यही बुज़दिल अचानक शेर बन जाते हैं। वे ग़नीमत में बड़े हिस्से का मुतालबा करते हैं और दावा करते हैं कि फ़तह में उनका बड़ा हाथ था।

[44] माले ग़नीमत की लालच

वे झूठा दावा करते हैं कि "हमने बड़ी बहादुरी से जंग लड़ी," ताकि अपनी पिछली बुज़दिली और सुस्ती के बावजूद माले ग़नीमत पर टूट पड़ें।

[45] निफ़ाक़ का बे-नक़ाब होना

यह आयत निफ़ाक़ की असली पहचान ज़ाहिर करती है: आज़माइश के वक़्त पीछे हटना और आराम के वक़्त बढ़-चढ़ कर बातें बनाना। इसके बरअक्स सच्चा मोमिन अमल ज़्यादा करता है और गुफ़्तगू कम।

[46] आमाल का ज़ाया (अकारथ) होना

ऐसे मुनाफ़िक़ों के ज़ाहिरी नेक आमाल भी सच्चे ईमान के बग़ैर बातिल और मरदूद हैं। जिस तरह कमज़ोर बुनियाद पर बनी इमारत ढह जाती है, उसी तरह ईमान के बग़ैर अच्छे आमाल की अल्लाह के नज़दीक कोई क़द्र नहीं।

[47] आमाल पर अल्लाह की क़ुदरत

अल्लाह तआला पूरी ज़िंदगी के आमाल को पल भर में अकारथ फ़रमा सकता है अगर वे ईमान के बग़ैर किए गए हों। साथ ही वह सच्ची तौबा से ज़िंदगी भर के गुनाहों को भी माफ़ फ़रमा सकता है। यह सब अल्लाह के लिए निहायत आसान है।

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