Transliteration: (Yahsaboonal Ahzaaba lam yazhaboo wa iny yaatil Ahzaabu yawaddoo law annahum baadoona fil A'raabi yasaloona 'an ambaaa'ikum wa law kaanoo feekum maa qaatalooo illaa qaleela (section 2))
"वे समझते हैं कि (काफ़िरों के) लश्कर [48] (काफ़िरों के इत्तिहादी) अभी नहीं गए, और अगर वे लश्कर फिर आ जाएं, तो ये तमन्ना करेंगे कि काश वे देहातियों के साथ सहरा में होते और वहीं से तुम्हारी ख़ैर-ख़बर पूछते रहते [49]। और अगर वे तुम्हारे दरमियान होते भी तो लड़ाई न करते मगर बहुत ही कम।"
जब दुश्मन तेज़ आंधी और फ़रिश्तों की गै़बी नुसरत की बदौलत इलाही क़ुदरत से भाग चुके थे, तब भी मुनाफ़िक़ ख़ौफ़ व दहशत में मुब्तला रहे, और यही गुमान करते रहे कि काफ़िरों के मुत्तहिदा लश्कर अभी यहीं मौजूद हैं और फिर लौट आएंगे। उनके दिल इलाही मदद या कामिल फ़तह के तसव्वुर को क़बूल ही नहीं कर पा रहे थे।
उनकी बुज़दिली इस इंतिहा को पहुँची हुई थी कि अगर दुश्मन दोबारा आ जाता, तो वे मदीना मुनव्वरा छोड़कर भाग जाते और सहरा में बदवियों (देहातियों) के पास छुप जाते, और ख़ुद मैदान में आने से डरकर सिर्फ़ दूर से ही जंग की ख़बरें पूछते रहते।
यह तर्ज़े अमल ज़ाहिर करता है कि वे इस्लाम के मिशन और अहले ईमान से कितने कटे हुए और बे-तअल्लुक़ थे। उनकी ख़्वाहिश सिर्फ़ यही थी कि किसी भी मुक़ाबले से दूर रहें और महफ़ूज़ मक़ाम पर बैठकर तमाशा देखें।
अगर वे जिस्मानी तौर पर मैदान-ए-जंग में मौजूद भी होते, तो भी वे सिर्फ़ दिखावे के लिए बे-दिली से शामिल होते, और उनके दिल और दिमाग़ पूरी तरह ग़ैर-हाज़िर होते। उनकी वफ़ादारी और बहादुरी महज़ ज़ाहिरी और झूठी थी।
यह आयत-ए-मुबारका उनके गहरे निफ़ाक़ को पूरी तरह बे-नक़ाब करती है और साबित करती है कि हक़ीक़ी ईमान सिर्फ़ ज़ाहिरी मौजूदगी से नहीं नापा जाता, बल्कि सख़्त आज़माइश में साबित-क़दमी और इख़्लास से परखा जाता है।
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