Transliteration: (Wa lammaa ra al mu'minoonal Ahzaaba qaaloo haazaa maa wa'adanal laahu wa Rasooluh; wa sadaqal laahu wa Rasooluh; wa maa zaadahum illaaa eemaananw wa tasleemaa)
"और जब मोमिनों ने (काफ़िरों के) लश्करों को देखा, तो कहा: 'यह वही है जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे वादा किया था [53], और अल्लाह और उसके रसूल ने सच फ़रमाया था;' और इस बात ने उनके ईमान और फ़रमांबरदारी (अल्लाह की रज़ा [54] के आगे) को और ज़्यादा बढ़ा दिया।"
हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ ने पहले ही मोमिनीन को ख़बर दे दी थी कि नौ या दस रातों के अंदर दुश्मन का लश्कर हमलावर होगा। चुनांचे जब मोमिनीन ने उन लश्करों को आते देखा, तो उनके ईमान को और ज़्यादा तक़वियत मिली क्योंकि उन्होंने अपनी आँखों से हुज़ूर ﷺ के फ़रमान की सच्चाई को पूरा होते देखा।
यह आयत-ए-मुबारका दर्शाती है कि मोमिन के लिए आज़माइश और तकलीफ़ अल्लाह तआला की रहमत का मज़हर है। जब मोमिन आज़माइशों पर सब्र करता है, तो वह साबिरीन के आला दरजे पर फ़ाइज़ होता है और अल्लाह और उसके प्यारे रसूल ﷺ पर उसका ईमान और यक़ीन और गहरा हो जाता है, जिससे अल्लाह की रज़ा के आगे उसकी फ़रमांबरदारी में इज़ाफ़ा होता है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat